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________________ 102] सर्वार्थसिद्धौ [1133 8 244मिति वा व्यवहार आश्रीयते । जीवाजीवावपि च संग्रहाक्षिप्तौ नालं संव्यवहारायेति प्रत्येक देवनारकादिर्धटाविश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनर्नास्ति विभागः । 8 245. ऋजुप्रगुणं सूत्रयति तन्त्रयतीति ऋजुसूत्रः । पूर्वापरांस्त्रिकालविषयानतिशय्य वर्तमानकालविषयानादते अतीतानागतयोविनष्टानुत्पन्नत्वेन व्यवहाराभावात् । तच्च वर्तमानं समयमात्रम् । तद्विषयपर्यायमात्रमाह्ययमृजुसूत्रः । ननु संव्यहारलोपप्रमङ्ग इति चेद् ? न; अस्य नयस्य विषयमात्रप्रदर्शनं क्रियते । सर्वनयसमूहसाध्यो हि लोकसंव्यवहारः। 8246. लिङ्गसंख्यासाधनादिव्यभिचारनिवृत्तिपरः शब्दनयः । तत्र लिङ्गव्यभिचारःपुष्यस्तारका नक्षत्रमिति । संख्याव्यभिचारः-जलमापः, वर्षा ऋतः, आम्रा वनम्, वरणा नगर मिति । साधनव्यभिचार::सेना' पर्वतमधिवसति । पुरुषव्यभिचारः-एहि मन्ये रथेन यास्यसि, न हि यास्यसि, यातस्ते पितेति । कालव्यभिचारः—विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता। भावि कृत्यमातीदिति । उपग्रहव्यभिचारः--संतिष्ठते प्रतिष्ठते विरमत्युपरमतीति । एवंप्रकारं व्यवहारमन्याय्यं10 वे व्यघहार करानेमें असमर्थ हैं, इसलिए व्यवहारसे जीव द्रव्यके देव, नारकी आदिरूप और अजीव द्रध्यके घटाटिरूप भेदोंका आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार इस नयकी प्रवृत्ति वहीं तक होती है जहाँ तक वस्तु में फिर कोई विभाग करना सम्भव नहीं रहता। 245. ऋजु का अर्थ प्रगुण है। जो ऋजु अर्थात् सरलको सूत्रित करता है अर्थात् स्वीकार करता है वह ऋजुसूत्र नय है । यह नय पहले हुए और पश्चात् होनेवाले तीनों कालोंके विषयोंको ग्रहण न करके वर्तमान कालके विषयभूत पदार्थोंको ग्रहण करता है, क्योंकि अतीतके विनष्ट और अनागतके अनुत्पन्न होनेसे उनमें व्यवहार नहीं हो सकता । वह वर्तमान काल समयमात्र है और उसके विषयभूत पर्यायमात्रको विषय करनेवाला यह ऋजुसूत्र नय है। शंका-इस तरह संव्यवहारके लोपका प्रसंग आता है ? समाधान-नहों; क्योंकि यहाँ इस नयका विषयमात्र दिखलाया है, लोक संव्यवहार तो सब नयों के समूहका कार्य है। 246. लिंग, संख्या और साधन आदिके व्यभिचारकी निवृत्ति करनेवाला शब्दनय है। लिंगव्यभिचार यथा--पूष्य, तारका और नक्षत्र। ये भिन्न-भिन्न लिंगके शब्द हैं। इनका मिलाकर प्रयोग करना लिंगव्यभिचार है। संख्याव्यभिचार यथा- 'जलं आपः, वर्षाः ऋतुः, आम्रा वनम्, वरणा: नगरम्' ये एकवचनान्त और बहुवचनान्त शब्द हैं। इनका विशेषणविशेष्यरूपसे प्रयोग करना संख्याव्यभिचार है। साधनव्यभिचार यथा-'सेना पर्वतमधिवसति' सेना पर्वतपर है। यहाँ अधिकरण कारकके अर्थमें सप्तमी विभक्ति न होकर द्वितीया विभक्ति है, इसलिए यह साधनव्यभिचार है। पुरुषव्यभिचार यथा--'एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यसि यातस्ते पिता' =आओ, तुम समझते हो कि मैं रथसे जाऊँगा, नहीं जाओगे । तुम्हारे पिता गये । यहाँ 'मन्यसे के स्थानमें 'मन्ये' और 'यास्यामि के स्थानमें 'यास्यसि क्रियाका प्रयोग किया गया है, इसलिए यह पुरुषव्यभिचार है । कालव्यभिचार यथा-'विश्वदृश्वास्य पुत्रो जनिता' = इसका विश्वदश्वा पुत्र होगा । 'यहाँ 'विश्वदश्वा' कर्ता रखकर 'जनिता क्रियाका प्रयोग किया गया है, इसलिए यह कालव्यभिचार है। अथवा, 'भाविकृत्यमासीत्' = होनेवाला कार्य हो गया । यहाँ होनेवाले कार्यको हो गया बतलाया गया है, इसलिए यह कालव्यभिचार है। उपग्रहव्यभिचार 1. यत इति ऋजु-मु., ता. ना.,। 2. पूर्वान्परा--मु.। 3.-षयमाद--आ. । 4. चेदस्य-दि. 1, दि. 2 । 5. वनमिति । साध--आ, दि. 1, दि. 2, ता., ना.। 6. -चारः (कारकव्यभिचारः) सेना-मु.। 7. सेना वनमध्यास्ते। पुरु-ता.। 8. 'एहि मन्ये रथेन यास्यसीति ।-पा. म. भा. 81111161 9. 'भाविकृत्यमासीत । पुत्रो जनिष्यमाण आसीत् । पा. म. मा. 3141112। 10.-हारनयं न्याय्यं-मु. दि. 1, दि. 2, आ.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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