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________________ --1133 8 244] प्रथमोऽध्यायः [101 परिगृहीतपरशुं गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स आह प्रस्थमानेतुमिति । नासौ तदा प्रस्यपर्यायः संनिहितः । तदभिनिवृत्तये संकल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारः। तथा एधोदकाद्याहरणे व्याप्रियमाणं कश्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आह ओदनं पचामीति । न तदौदनपर्यायः संनिहितः, तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते। एवंप्रकारो लोकसंव्यवहारः अनभिनिवत्तार्थसंकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः। $ 243. स्वजात्यविरोधेनकध्यमुपानीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः । सत, द्रव्यं, घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुप्रवृत्तिलिङ्गानुमितसत्ताधारभूतानामविषेण सर्वेषां संग्रहः । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपलक्षितानां जीवाजवतभेदप्रभेदानां संग्रहः । तथा घट इत्युक्तेऽपि घटबुद्ध्यभिधानानुगमलिङ्गानुमितसकलार्थसंग्रहः। एवंप्रकारोऽन्योऽपि संग्रहनयस्य विषयः। 244. संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वकमवहरणं व्यवहारः । को विधिः ? यः संग्रहगृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्वेणैव व्यवहारः प्रवर्तत इत्ययं विधिः । तद्यथा-सर्वसंग्रहेण यत्सत्त्वं गृहीतं तत्त्चानपेक्षितविशेषं नालं संव्यवहारायेति व्यवहारनय आश्रीयते। यत्सत्तद् द्रव्यं गुणो वेति । द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीवद्रव्यमजीवद्रव्यपूछता है आप किस कामके लिए जा रहे हैं । वह कहता है प्रस्थ लानेके लिए जा रहा हूँ। उस समय वह प्रस्थ पर्याय सन्निहित नहीं है, केवल उसके बनानेका संकल्प होनेसे उसमें प्रस्थ व्यवहार किया गया है । तथा ईंधन और जल आदिके लाने में लगे हुए किसी पुरुषसे कोई पूछता है कि आप क्या कर रहे हैं। उसने कहा भात पका रहा हूँ। उस समय भात पर्याय सन्निहित नहीं है, केवल भातके लिए किये गये व्यापारमें भातका प्रयोग किया गया है। इस प्रकारका जितना लोकव्यवहार अनिष्पन्न अर्थके आलम्बनसे संकल्पमात्रको विषय करता है वह सब नेगम नयका विषय है। 8243. भेदसहित सब पर्यायोंको अपनी जातिके अविरोध-द्वारा एक मानकर सामान्यसे सबको ग्रहण करनेवाला नय संग्रहनय है । यथा-सत्, द्रव्य और घट आदि। 'सत्' ऐसा कहनेपर सत् इस प्रकारके वचन और विज्ञानकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सत्ताके आधारभूत सब पदार्थों का सामान्यरूपसे संग्रह हो जाता है । 'द्रव्य' ऐसा कहनेपर भी 'उन-उन पर्यायोंको द्रवता है अर्थात् प्राप्त होता है' इस प्रकार इस व्युत्पत्तिसे युक्त जीव, अजीव और उनके सब भेदप्रभेदोका संग्रह हो जाता है। तथा 'घट ऐसा कहनेपर भी घट इस प्रकारकी बुद्धि और घट इस प्रकारके शब्दकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सब घट पदार्थोका संग्रह हो जाता है। इस प्रकार अन्य भी संग्रह नयका विषय है। 244. संग्रह नयके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंका विधिपूर्वक अवहरण अर्थात् भेद करना व्यवहार नय है । शंका-विधि क्या है ? समाधान-जो संग्रह नयके द्वारा गृहीत अर्थ है उसीके आनुपूर्वी क्रमसे व्यवहार प्रवृत्त होता है, यह विधि है । यथा-सर्वसंग्रह नयके द्वारा जो वस्तु ग्रहण की गयी है वह अपने उत्तर भेदोंके बिना व्यवहार कराने में असमर्थ है, इसलिए व्यवहार नयका आश्रय लिया जाता है । यथा—जो सत् है वह या तो द्रव्य है या गुण। इसी प्रकार संग्रह नयका विषय जो द्रव्य है वह जीव अजीव विशेषकी अपेक्षा किये बिना व्यवहार कराने में असमर्थ है, इसलिए जीव द्रव्य है और अजीव द्रव्य है इस प्रकारके व्यवहारका आश्रय लिया जाता है। जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य भी जब तक संग्रह नयके विषय रहते हैं तब तक 1. संग्रहनयः ।।2। संग्र--मु.। 2. यत्संग्र-मु., दि. 1, दि. 2, आ.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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