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________________ 12] सर्वार्थसिद्धि . समयमें अन्य सासादनसम्यग्दृष्टि दो दिराह करके अनाहारक हुए । इस प्रकार निरन्तर आवलिके असंख्यातवें भाग बार जीव दो-दो समय तक अनाहारक होते रहे । इसलिए आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काण्डकोंको दो से गुणा करने पर अनाहारक सासादनसम्यग्दृष्टियोंका कुल काल उपलब्ध होता है (जीवस्थान पु० ४)। अधितर हस्तलिखित प्रतियोंमें यह देखा जाता है कि पीछेसे अनेक स्यलों पर विषयको स्पष्ट करने के लिए अन्य ग्रन्थोंके श्लोक, गाथा, वाक्यांश या स्वतन्त्र टिप्पणियाँ जोड़ दी जाती हैं और कालान्तरमें वे ग्रन्थका अंग बन जाती हैं। सर्वार्थसिद्धिमें यह व्यत्यय बहुत ही बड़ी मात्रा में हुआ है। ऐसे तीन उदाहरण तो हम इस वक्तव्यके प्रारम्भ में ही उपस्थित कर आये हैं। कहना होगा कि यह किसी टिप्पणनकारकी सूझ है और उसने अपनी दष्टिसे विषय को स्पष्ट करने के लिए पहले वे वाक्य फुटनोटके रूप में हासियामें लिखे होंगे और आगे चलकर उसपर-से दूसरी प्रति तैयार करते समय वे ही मूल ग्रन्थके अंग बन गये होंगे। इसके सिवा आगे भी ऐसे कई वाक्यांश या गाथाएँ मिली हैं जो अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध नहीं होती और जिन्हें दूर कर देनेसे प्रकरणकी कुछ भी हानि नहीं होती। यहाँ हम कुछ ऐसे उपयोगी वाक्यांशके दो-तीन उदाहरण उपस्थित कर रहे हैं जो प्राचीन संस्करणोंमें थे और इस संस्करणमें-से अलग करने पड़े हैं 1. कुछ प्रतियोंमें तृतीय अध्याय के प्रथम सूत्रकी वृत्तिमें 'धनं च घनो मन्दो महान आयत इत्यर्थः' आदि पाठ उपलब्ध होता है । अब तककी मुद्रित प्रतियोंमें भी यह पाठ प्रकाशित हुआ है। हमारे समाने जो प्रतियाँ थीं उनमें से अधिकतर प्रतियों में यह पाठ नहीं है और वृत्ति को देखते हुए वह वृत्तिकारका प्रतीत भी नहीं होता, इसलिए इस पाठ को ऊपर न देकर नीचे टिप्पणी में दिखा दिया है। 2. नौवें अध्याय नौवें सूत्रके मलपरीषहके व्याख्यानके अन्त में 'केशलञ्चसंस्काराभ्यामुत्पन्नखेवसहनं मलसामान्यसहनेऽन्तर्भवतीति न पृथगुक्तम् ।' यह वाक्य मुद्रित प्रतियों में उपलब्ध होता है। किन्तु हमारे सामने जो हस्तलिखित प्रतियां थीं उनमें यह वाक्य नहीं पाया जाता । वाक्य-रचनाको देखते हुए यह सर्वार्थसिद्धिका प्रतीत भी नहीं होता। तथा किसी परीषहका स्वरूपनिर्देश करने के बाद सर्वार्थसिद्धि में पुनः उस परीषहके सम्बन्धमें विशेष स्पष्टीकरण करनेकी परिपाटी भी नहीं दिखाई देती, इसलिए हमने इस वाक्यको मूलमें न देकर टिप्पणी में अलगसे दिखा दिया है। 2. प्रस्तुत संस्करणमें स्वीकृत पाठको विशेषता यह हम पहले ही निर्देश कर आये हैं कि प्रस्तुत संस्करणके पहले सर्वार्थसिद्धिके अनेक संस्करण प्रकाशमें आ चुके थे। ऐसी अवस्थामें प्रस्तुत संस्करण के सम्पादनके किसी पाठको स्वीकार करने या अस्वीकार करने में हमारे सामने बड़ी कठिनाई रही है । साधारणत: हमने इस बात का ध्यान रखा है कि मुद्रित प्रतियोंमें जो पाठ उपलब्ध होते हैं, सर्वप्रथम उन्हें ही प्रमुखता दी जाय । किन्तु इस नियमका हम सर्वत्र पालन नहीं कर सके । यदि हमें उनसे उपयुक्त पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध हुए तो उन्हें स्वीकार करने में हमने संकोच नहीं किया। 3. प्रति परिचय और भी ऐसी अनेक कई बातें थीं जिनके कारण हमने कई प्राचीन प्रतियोंके आधारसे इसे पुन सम्पादित करनेका निश्चय किया इसके लिए हमने मूडबिद्रीकी दो ताडपत्रीय प्रतियाँ, दिल्ली भाण्डारसे दं, हस्तलिखित प्रतियाँ और जैन सिद्धान्तभवन आरासे एक हस्तलिखित प्रति प्राप्त की। मुद्रित संस्करणोंमें से हमारे सामने श्री पं० कल्लप्पा भरमप्पा निटवे द्वारा सम्पादित और श्री पं० वंशीधरजी सोलापुर द्वारा सम्पादित प्रतियाँ थीं। इस काममें मूडबिद्रीकी एक ताडपत्रीय प्रति और दिल्ली भाण्डारकी एक हस्तलिखित प्रति विशेष उपयोगी सिद्ध हुई। अन्य प्रतियोंकी अपेक्षा ये अधिक शुद्ध थीं। फिर भी आदर्श प्रतिके रूपमें हम किसी एक को मुख्य मानकर न चल सके। हम यह तो नहीं कह सकते कि सर्वार्थसिद्धिका प्रस्तुत संस्करण सब दृष्टियोंसे अन्तिम है, फिर भी इसे सम्पादित करते समय इस बातका ध्यान अवश्य रखा गया Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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