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________________ --1124 § 221] प्रथमोऽध्यायः [93 न प्रतिपातः अप्रतिपातः । उपशान्तकषायस्य चारित्र नोहोद्रेकात्प्रच्युत संयम शिखरस्य प्रतिपातो भवति । क्षीणकषायस्य प्रतिपातकारणाभावादप्रतिपातः । विशुद्धिश्च अप्रतिपातश्च विशुद्ध्यप्रतिपातौ । ताभ्यां विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेषः । तत्र विशुद्ध्या तावत्-ऋजुमतेविपुलमति द्रव्यक्षेत्रकालभावैविशुद्धतरः । कथम् ? इह यः कार्मणद्रव्यानन्तभागोऽन्त्यः सर्वावबिना ज्ञातस्तस्य पुनरनन्तभागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेविषयः । तस्य ऋजुमतिविषयस्यानन्तभागीकृतस्यान्त्यो भागो विपुलमतेविषयः । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् । द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुक्ता । भावतो विशुद्धिः सूक्ष्मतरद्रव्यविषयत्वादेव वेदितव्या, प्रकृष्टक्षयोपशमविशुद्धियोगात् । अप्रतिपातेनापि विपुलमतिविशिष्टः; स्वामिनां प्रवर्द्धमानचारित्रोदयत्वात् । ऋजुमतिः पुनः प्रतिपाती; स्वामिनां कषायोद्रेकाद्धीयमानचारित्रोदयत्वात् । $ 221. यद्यस्य मनःपर्ययस्य प्रत्यात्ममयं विशेषः, अथानयोरवधिमनः पर्यययोः कुतो विशेष इत्यत आह- उसे विशुद्धि कहते हैं । गिरनेका नाम प्रतिपात है और नहीं गिरना अप्रतिपात कहलाता है । उपशान्तकषाय जीवका चारित्र मोहनीयके उदयसे संयम शिखर छूट जाता है, जिससे प्रतिपात होता है और क्षीणकषाय जीवका पतनका कारण न होनेसे प्रतिपात नहीं होता । इन दोनोंकी अपेक्षा ऋजुमति और विपुलमतिमें भेद है । विशुद्धि यथा----ऋजुमतिसे विपुलमति द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा विशुद्धतर है । शंका- कैसे ? समाधान - यहाँ जो कार्मण द्रव्यका अनन्तवाँ अन्तिम भाग सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके भी अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त होता है वह ऋजुमतिका विषय है । और इस ऋजुमतिके विषयके अनन्त भाग करने पर जो अन्तिम भाग प्राप्त होता है वह विपुलमतिका विषय है । अनन्तके अनन्त भेद हैं अतः ये उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषय बन जाते हैं। इस प्रकार द्रव्य, क्षेत्र और कालकी अपेक्षा विशुद्धि कही। भावकी अपेक्षा विशुद्धि उत्तरोत्तर सूक्ष्म द्रव्यको विषय करनेवाला होनेसे ही जान लेनी चाहिए, क्योंकि इनके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट क्षयोपशम रूप विशुद्धि पायी जाती है, इसलिए ऋजुमतिसे विपुलमतिमें विशुद्धि अधिक होती है । अप्रतिपातकी अपेक्षा भी विपुलमति विशिष्ट है; क्योंकि इसके स्वामियोंके प्रवर्धमान चारित्र पाया जाता है । परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है; क्योंकि इसके स्वामियोंके कषायके उदयसे घटता हुआ चारित्र पाया जाता है । विशेषार्थ —— यहाँ मन:पर्यय ज्ञानके दोनों भेदोंमें अन्तर दिखलाया गया है। ऋजुमति स्थूल ज्ञान है और विपुलमति सूक्ष्मज्ञान । इसीसे इसका भेद स्पष्ट हो जाता है । यह विशुद्धिकृत भद है । इससे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा पदार्थका ज्ञान करनेमें अन्तर पड़ जाता है । किन्तु इन दोनों ज्ञानोंके अन्तरका एक कारण और है जो कि प्रतिपात और अप्रतिपात शब्दसे पुकारा जाता है । प्रतिपातका अर्थ है गिरना और अप्रतिपातका अर्थ है नहीं गिरना । ऐसा नियम है कि विपुलमति मन:पर्ययज्ञान उसीके होता है जो तद्भव मोक्षगामी होते हुए भी क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है, किन्तु ऋजुमति मन:पर्यय ज्ञानके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। वह तद्भव मोक्षगामी भी हो सकता है और अन्यके भी हो सकता है। इसी प्रकार जो क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है उसके भी हो सकता है और जो उस पर नहीं चढ़कर उपशमश्रेणी पर चढ़ता है या नहीं भी चढ़ता है उसके भी हो सकता है । इसीसे ऋजुमति प्रतिपाती और विपुलमति अप्रतिपाती माना गया है । यह विशेषता योग्यताजन्य है, इसलिए इसका निर्देश अलगसे किया है । 1 8221. यदि इस मन:पर्ययज्ञानका अलग-अलग यह भेद है तो अवधिज्ञान और मन:पर्यय ज्ञानमें किस कारणसे भेद है ? अब इसी बात बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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