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________________ 92] सर्वार्थसिद्धौ [1123 8 218 --- ज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मनः परकीयमनःसंबन्धेन लब्धवृत्तिरुपयोगो मनःपर्ययः । मतिज्ञानप्रसंग इति चेत् ? उक्तोत्तरं पुरस्तात् । अपेक्षाकारणं मन इति । परकीयमनसि व्यवस्थितोऽर्थः अनेन ज्ञायते इत्येतावदत्रापेक्ष्यते । तत्र ऋजुमतिर्मनःपर्ययः कालतो जघन्येन जीवानामात्मनश्च द्वित्राणि भवग्रहणानि, उत्कर्षेण सप्ताष्टौ गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो जघन्येन गन्यूतिपृथक्त्वं, उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तरं, न बहिः। द्वितीयः कालतो जघन्येन सप्ताण्टौ भवग्रहणानि, उत्कर्षेणासंख्येयानि गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो जघन्येन योजनपृथक्त्वं, उत्कर्षेण मानुषोत्तरशलस्याभ्यन्तरं, न बहिः । 219. उक्तयोरनयोः पुनरपि विशेषप्रतिपत्यर्थमाह विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥24॥ 8220. तदावरणक्षयोपशमे सति आत्मनः प्रसादो विशुद्धिः । प्रतिपतनं प्रतिपातः । समाधान-वीर्यान्तराय और मनःपर्यय ज्ञानावरणके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके आलम्बनसे आत्मामें जो दूसरेके मनके सम्बन्धसे उपयोग जन्म लेता है उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं। शंका-यह ज्ञान मनके सम्बन्धसे होता है, अतः इसे मतिज्ञान होनेका प्रसंग आता है ? समाधान-नहीं, क्योंकि इस शंकाका उत्तर पहले दे आये हैं । अर्थात् यहाँ मनकी अपेक्षामात्र है। दूसरेके मनमें अवस्थित अर्थको यह जानता है इतनी मात्र यहाँ मनकी अपेक्षा है। इनमेंसे ऋजुमति मन:पर्ययज्ञान कालकी अपेक्षा जघन्यसे जीवोंके और दो तीन भावोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति और आगतिकी अपेक्षा सात-आठ भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे गव्यू तिपृथक्त्व और उत्कृष्टसे योजनपृथक्त्वके भीतरकी बात जानता है, इससे बाहरकी नहीं । विपुलमति कालकी अपेक्षा जघन्यसे सात-आठ भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति और आगतिकी अपेक्षा असंख्यात भवोंका कथन करता है। क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे योजनापृथक्त्व और उत्कृष्टसे मानुषोत्तर पर्वतके भीतरको बात जानता है, इससे बाहरकी बात नहीं जानता। विशेषार्थ---तत्त्वार्थसूत्रके छठवें अध्यायके दसवें सूत्रके राजवातिकमें शंका-समाधानके प्रसंगसे मनःपर्ययज्ञानकी चर्चा की है। वहाँ बतलाया है कि मनःपर्ययज्ञान अपने विषयमें अवधिज्ञानके समान स्वमुखसे प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु दूसरेके मनके सम्वन्धसे ही प्रवृत्त होता है, इसलिए जैसे मन अतीत और अनागत विषयोंका विचार तो करता है, पर साक्षात्कार नहीं करता उसी प्रकार मनःपर्ययज्ञानी भी भुत और भविष्यत विषयोंको जानता तो है पर सीधे तोरसे साक्षात्कार नहीं करता। इसी प्रकार यह वर्तमान विषयको भी मनोगत होते पर विशेषरूपसे जानता है। राजवातिकका यह कथन इतना स्पष्ट है जिससे मनःपर्ययज्ञानको उपयोगात्मक दशाका स्पष्ट आभास मिल जाता है। इसका आशय यह है कि करता तो है यह मन की पर्यायोंको ही विषय किन्तु तद्वारा पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है । इसके दो भेद हैं---ऋजुमति और विपुलमति । 219. पहले मनःपर्ययज्ञानके दो भेद कहे हैं उनका और विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--- विशुद्धि और अप्रतिपातकी अपेक्षा इन दोनोंमें अन्तर है ॥24॥ 8220. मनःपर्ययज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेपर जो आत्मामें निर्मलता आती है 1.-पेक्षते आ. दि.1, दि. 21 2. --द्वित्रीणि मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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