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________________ -119 § 164] प्रथमोऽध्यायः [67 8161. आहारानुवादेन आहारकाणां काययोगिवत् । अनाहारकाणां सर्वतः स्तोकाः सयोगकेवलिनः । अयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः । सासादन सम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्ट योऽसंख्येयगुणाः । मिथ्यादृष्ट्योऽनन्तगुणाः । I 8162 एवं मिथ्यादृष्ट्यादीनां गत्यादिषु मार्गणा कृता सामान्येन । तत्र सूक्ष्मभेद आगमाविरोधेनानु सर्तव्यः । 8163. एवं सम्यग्दर्शनस्यादावुद्दिष्टस्य लक्षणोत्पत्तिस्वामिविषयन्यासाधिगमोपाया निर्दिष्टाः । तत्संबन्धेन च जीवादीनां संज्ञापरिमाणावि निर्दिष्टम् । तदनन्तरं सम्यग्ज्ञानं विचारार्हमित्याह मतिश्रुतावधिमनः पर्यय केवलानि ज्ञानम् ॥१॥ 8 164. ज्ञानशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं मन:पर्ययज्ञानं केवलज्ञानमिति । इन्द्रियैर्मनसा च यथास्वमर्थो मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः । तदातरण' कर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन' तत् शृणोति श्रवणमात्रं वा श्रुतम् । अनयोः प्रत्यासन्न निर्देशः कृतः कार्यकारणभावात् । तथा च वक्ष्यते "श्रुतं मतिपर्वम्" इति । अवाग्धानादवfच्छन्नविषयाद्वा अवधिः । परकीयमनोगतोऽर्थो मन इत्युच्यते । साहचर्यात्तस्य पर्ययणं 8161. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंका अल्पबहुत्व काययोगियोंके समान है । अनाहारकों में सयोगकेवली सबसे थोड़े हैं। इनसे अयोगकेवली संख्यातगुणे हैं । इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं । अल्पबहुत्वका कथन समाप्त हुआ । $ 162. इस प्रकार गत्यादि मार्गणाओंमें मिथ्यादृष्टि आदिका सामान्यसे विचार किया। इसमें उत्तरोत्तर सूक्ष्म भेद आगमानुसार जान लेना चाहिए । 8163. इस प्रकार सर्व प्रथम कहे गये सम्यग्दर्शनके लक्षण, उत्पत्ति, स्वामी, विषय न्यास और अधिगमका उपाय कहा । और उसके सम्बन्धसे जीवादिकोंकी संज्ञा और परिमाण आदि भी कहा । अब इसके बाद सम्यग्ज्ञान विचार योग्य है इसलिए आगेका सूत्र कहते हैंमतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँच ज्ञान हैं ||9|| 164. सूत्रमें ज्ञान शब्द मति आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए। यथामतिज्ञान, श्रुतज्ञान, • अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान । मतिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है - 'इन्द्रियैर्मनसा च यथा स्वमर्थो मन्यते अनया मनुते मननमात्रं वा मतिः' इन्द्रिय और मनके द्वारा यथायोग्य पदार्थ जिसके द्वारा मनन किये जाते हैं, जो मनन करता है या मननमात्र मति कहजाता है। श्रुतका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- 'तदावरणकर्मक्षयोपशमे सति निरूप्यमाणं श्रूयते अनेन ति श्रवणमात्रं वा श्रुतम् = श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होने पर निरूप्यमाण पदार्थ जिसके द्वारा सुना जाता है, जो सुनता है या सुननामात्र श्रुत कहलाता है। मति और श्रुत इन दोनों ज्ञानों का समीपमें निर्देश किया है क्योंकि इनमें कार्य कारणभाव पाया जाता है। जैसा कि आगे कहेंगे 'श्रुतं मतिपूर्वम् ।' अवधिका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ = अधिकतर नीचेके विषयको जानने f 1. स्वमर्थान्मन्यते मु. 2. - वरणक्षयों - मु. 3. अनेनेति तत् - मु. 4. ' अवाग्धानादवधि: अथवा अधोगौरवधर्मत्वात्पुद्गलः प्रवाङ् नाम तं दधाति परिच्छिनत्तीति अवधि : अवधिरेव ज्ञानं अवधिज्ञानम् । अथवा अवधिर्मर्यादा प्रवधिना सह वर्तमानज्ञानमवविज्ञानम् । —धव प्र. अ. प. 865 आरा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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