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________________ 64] सथिसिद्धौ [11881498149. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकेषु सर्वतः स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः। मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । नियंग्गतौ तिरश्चां सर्वतः स्तोकाः संयतासंयताः। इतरेषां सामान्यवत् । मनुष्यगतौ मनुष्याणामुपशमकादिप्रमत्तसंयतान्तानां सामान्यवत् । ततः संख्येयगुणाः संयतासयताः। सासादनसम्यग्दृष्टयः सस्येयगुणाः । सम्यग्मिय्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयः संख्येयगुणाः । मिय्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । देवगतौ देवानां नारकवत् । $ 150. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभावः । पञ्चेन्द्रियाणां सामान्यवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । 8151. कायानुवादेन स्थावरकायेषु गुणस्थानभेदाभावादल्पबहुत्वाभावः । त्रसकायिकानां पञ्चेन्द्रियवत् । 8152. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां पञ्चेन्द्रियवत् । काययोगिनां सामान्यवत् । धेदानुवादेन स्त्रीवेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् । $ 153. कषायानुवादेन क्रोधमानमायाकषायाणां पुंवेदवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः । लोभकषायाणां द्वयोरुपशमकयोस्तुल्या संख्या। क्षपकाः संख्येयगुणाः । सूक्ष्मसांप 8149. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं । इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। तिर्यंचगतिमें तिथंचोंमें संयतासंयत सबसे थोड़े हैं । शेष गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। मनुष्यगतिमें मनुष्योंके उपशमकोंसे लेकर प्रमत्तसंयत तकका अल्पबहत्व ओघके समान है। प्रमत्तसंयतोंसे संयतासंयत संख्यातगुणे हैं । इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। देवगतिमें देवोंका अल्पबहत्व नारकियोंके समान है। 8150. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे अल्पबहुत्व नहीं है । पंचेन्द्रियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि असंयत सम्यग्दृष्टि पंचेन्द्रियोंसे मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय असंख्यातगुणे हैं। 8151. काय मार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिकोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे अल्पबहुत्व नहीं है । त्रसकायिकोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। 8152. योग मार्गणाके अनुवादसे वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। काययोगियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। नपुंसकवेदी और वेदरहित जीवोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। 8153. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोधकषायवाले, मानकषायवाले और मायाकषायवाले जीवोंका अल्पबहत्व पुरुषवेदियोंके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें असंयत सम्यग्दष्टियोंसे मिथ्यादष्टि अनन्तगण हैं। लोभ कपायवालोंमें दोनों उपशमकोंकी संख्या समान है। इनसे क्षपक संख्यातगुणे हैं । इनसे सूक्ष्मसाम्परायशुद्धि उपशमकसंयत विशेष अधिक हैं। इनसे 1. भावः । इन्द्रियं प्रत्युच्यते। पंचेन्द्रियाद्ये केन्द्रियान्ता उत्तरोत्तरं बहवः । पंचे-मु.। 2. भावः कार्य प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेजःकायिका अल्पाः । ततो बहवः पृथिवीकायिकाः । ततोऽप्यप्कायिकाः। ततो वातकायिकाः । सर्वतोऽनन्तगुणा वनस्पतयः । स--मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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