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________________ --1188148] प्रथमोऽध्यायः [63 सम्यक्त्वम् । असंयतः पुनरोदयिकेन भावेन। संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः । क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वम् । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । असंयतः पुनरोदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टः पारिणामिको भावः । सम्यमिथ्यादृष्टेः क्षायोपशमिको भावः । मिथ्यादृष्टेरोदयिको भावः । 8146. संज्ञानुवादेन संजिनां सामान्यवत् । असंज्ञिनामौदयिको भावः । तदुभयव्यपदेशरहितानां सामान्यवत्। 8147. आहारानुवादेन आहारकाणामनाहारकाणां च सामान्यवत् । भावः परिसमाप्तः। 8148. अल्पबहुत्वमुपवर्ण्यते । तद् द्विविघं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् सर्वतः स्तोकाः त्रय उपशमकाः स्वगुणस्थानकालेषु प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । उपशान्तकषायास्तावन्त एप प्रयः क्षपकाः संख्येयगुणाः । क्षीणकषायवीतरागच्छमस्थास्तावन्त एव । सयोगकेवलिनोsबोगकेवलिनश्च प्रवेशेन तुल्यसंख्याः। सयोगकेवलिनःस्वकालेन समुदिताः संख्येयगुणाः। अप्रमत्त संयताः संख्येयगुणाः । प्रमतसंयताः संल्येयगुणाः । संयतासंयता असंख्येयगुणाः। सासावनसम्यग्वृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । सम्यग्मिच्यादृष्टयः संख्येगुणाः। असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः। मिष्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः । सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। औपशमिक सम्यग्दष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक भाव है । औपशमिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव हैं। औपशमिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है। औपशमिक सम्यक्त्व है। सासादनसम्यग्दृष्टिके पारिगामिक भाव है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिके क्षायोपशमिक भाव है। मिथ्यादृष्टिके औदयिक भाव है। 8146. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंके ओघके समान भाव हैं । असंज्ञियोंके औदयिक भाव हैं। तथा संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंके ओघके समान भाव हैं। 8147. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारक और अनाहारक जीवोंके ओघके समान भाव हैं । इस प्रकार भाव समाप्त हुआ। 8148. अब अल्पबहुत्वका कथन करते हैं। वह दो प्रकारका है सामान्य और विशेष । सामान्यकी अपेक्षा तीनों उपशमक सबसे थोड़े हैं जो अपने-अपने गुणस्थानके कालोंमें प्रवेशकी अपेक्षा समान संख्यावाले हैं। उपशान्तकषाय जीव उतने ही हैं । इनसे अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानके क्षपक संख्यात गुणे हैं । क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ उतने ही हैं । सयोगकेवली और अयोगकेवली प्रवेशकी अपेक्षा समान संख्यावाले हैं। इनसे अपने कालमें समुदित हए सयोगकेवली संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं । इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं । इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिध्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं। 1.-संपता संख्ये--मु. 1 2.-दृष्टयः असंख्ये--मु.। 3. कमसे कम एक और अधिक से अधिक चौवन । 4. कमसे कम एक और अधिकसे अधिक एक सौ आठ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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