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________________ -1188 126] प्रथमोऽध्यायः [57 $ 124. तेजःपमलेश्ययोमिथ्यावृष्टयसंयतसम्यग्दृष्टयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि। सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकज़ीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि। संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्स्यन्तरम् । $ 125. शुक्ललेश्येषु मिथ्यादृष्टयसंयतसम्यग्दृष्टयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकनीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षणकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यमिथ्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यक्त् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंल्येयभागोतमुहूर्तश्च । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । संयतासंयतप्रमत्तसयतोस्तेजोलेश्यावत् । अप्रमत्तसंपतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्ट चान्तमूहर्तः । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्ट चान्तर्महर्तः। उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत । एकजीवं प्रति नास्स्यन्तरम् । चतुर्णा क्षपकाणां सयोगकेवलिनामलेश्यानां च सामान्यवत् । 126. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्टयाद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्याना 8124. पीत और पद्म लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तम हतं और उत्कृष्ट अन्तर दोनों लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागरोपम और साधिक अठारह सागरोपम है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है और एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्योपमका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर दोनों लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागरोपम और साधिक अठारह सागरोपम है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीव और एक जे की अपेक्षा अन्तर नहीं है। 8125. शुक्ल लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागरोपम है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्योपमका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागरोपम है। संयतासंयत और मत्तसयतका अन्तरकथन पतिलेश्याक समान है। तथा अप्रमत्तसयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त हैं । तीन उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान हैं। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तम हर्त है। उपशान्तकषायका नाना जीवकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है तथा एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। चारों क्षपक, सयोगकेवली और लेश्यारहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है। $126. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक 1.-हर्तः । अयदो ति छ लेस्साओ सुहतिय लेस्सा हु देसबिरदतिये । तत्तो दु सुक्कलेस्सा अजोगिठाणं अलेस्सं तु ॥ त्रयाणा-मु. 1 2. उपशमश्रेणिसे अन्तरित कराके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तम हर्स प्राप्त करना चाहिए। 3. अप्रमत्तसंयतसे अन्तरित कराके यह अन्तर प्राप्त करना चाहिए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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