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________________ 551 --118 $ 121] प्रथमोऽध्यायः एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । मनःपर्ययज्ञानिषु प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । चतुर्णां क्षपकाणामवधिज्ञानिवत् । द्वयोः केवलज्ञानिनोः सामान्यवत् । 121. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । द्वयोरुपशमकयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण पूवकोटी देशोना। द्वयोः क्षपकयोः सामान्यवत् । परिहारशुद्धिसयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धि संयतेषूपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीव प्रति नास्त्यन्तरम् । तस्यैव क्षयकस्य सामान्यवत् । यथाख्याते अकषायवत् । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । असंयतेषु मिथ्यादृष्टेन नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रस्त्रिशत्सागरोपमाणि देशोनानि । शेषाणां त्रयाणां सामान्यवत् । एक जोवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । मनःपर्यज्ञानियोंमें प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहुर्त है। चारों उपशमकोंका नाना जोवोंको अपेक्षा अन्तर ओषके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटी है । चारों क्षपकोंका अन्तर अवधिज्ञानियोंके समान है । दोनों केवलज्ञानियोंका अन्तर ओघके समान है। 121. संयम मार्गणाके अनुवादसे सामायिक शुद्धिसंयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतोंमें प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं हैं । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त है। दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटी है । दोनों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। परिहारशु द्धि संयतोंमें प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जोवको अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त है। सूक्ष्मसाम्परायशद्धिसंयतोंमें उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जोवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। तथा उसी सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकका अन्तर ओघके समान है। यथाख्यातमें अन्तर कषायरहित जीवोंके समान है। संयतासंयतका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । असंयतोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागरोपम' है । शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है। 1. —यमे उप-आ., दि. 1, दि. 2, ता.। 2. उपशमश्रेणि और प्रमत्त-अप्रमत्तका काल अन्तर्मुहूर्त होनेरे मनःपर्ययज्ञानी प्रमत्त और अप्रमत्तका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अंतर्मुहूर्त बन जाता है । 3. आठ वर्ष और 12 अंतर्मुहुर्त कम एक पूर्वकोटि । 4. प्रमत्तको अप्रमत्तसे और अप्रमत्तको प्रमत्तसे अंतरित कराके यह अंतर ले आना चाहिए। 5. आठ वर्ष और ग्यारह अंतर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अपूर्वकरणका उत्कृष्ट अंतर है । अनिवृत्तिकरणका समयाधिक नौ अंतर्मुहुर्त और आठ वर्ष कम एक पूर्व कोटि उत्कृष्ट अंतर है। 6. प्रमत्त और अप्रमत्तको परस्पर अंतरित करानेसे यह अंतर आ जाता है। 7. यह अंतर सातवें नरकमें प्राप्त होता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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