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________________ 54] सर्वार्थसिद्धौ -1188 119 ] न्तानां मनोयोगिवत् । द्वयोः क्षपकयो नाजीवापेक्षया जघन्ये नेकः समयः। उत्कर्षेण संवत्सरः सातिरेकः । केवललोभस्य सूक्ष्मसांपरायोपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । क्षपकस्य तस्य सामान्यवत् । अकवायेषु उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां त्रयाणां सामान्यवत् । 120. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानिषु मिथ्यादृष्टेना जीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टेना जीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानिषु असंयतसम्यग्दृष्टे नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना। संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहर्तः । उत्कर्षेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि । प्रमत्ताप्रमत्तयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षण त्रयस्त्रिशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि। चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णां क्षपकाणां सामान्यवत् । किंतु अवधिज्ञानिषु नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । अनिवृत्तिबादर उपशमक तक प्रत्येक गुणस्थानका अन्तर मनोयोगियोंके समान है । दोनों क्षपकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक वर्ष लोभ कषायमें सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सूक्ष्मलोभवाले क्षपकका अन्तर ओघके समान है। व रहित जीवोंमें उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है। 120. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादष्टिका नाना जीवों और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। सासादन सम्यग्दष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटी है । संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्सर अन्तमूहर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागरोपम है । प्रमत्तसंयत और अप्रभत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागरोपम है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छयासठ सागरोपम है। चारों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। किन्तु अवधिज्ञानियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। 1. चार अंतर्मुहूर्त कम पूर्व कोटि । 2. आठ वर्ष और ग्यारह अंतर्मुहूर्त कम तीन पूर्वकोटि अधिक छयासठ सागरोपम । किन्तु अवधिज्ञानीके ग्यारह अंतर्मुहूर्तके स्थानमें 12 अंतमुहूर्त कम करना चाहिए । 3. प्रमत्तके साढ़े तीन अंतर्मुहूर्त कम पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागरोपम उत्कृष्ट अन्तर है । और अप्रमत्तके दो अंतमुहर्त कम पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागरोपम उत्कृष्ट अन्तर है। 4. तीन या चार पूर्व कोटि अधिक छयासठ सागरोपम । किंतु इसमें-से चारों उपशमकोंके क्रमसे 26, 24, 22 और 20 अंतमुहर्त तथा आठ वर्ष कम कर देना चाहिए। 5. अवधिज्ञानी प्राय: बहुत ही कम होते हैं, इसलिए इतना अंतर बन जाता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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