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________________ सर्वार्थसिद्धी [1188114नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्र पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिके । शेषाणां पञ्चेन्द्रियवत् । 8115. योगानुवादेन कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्टयसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमताप्रमत्तसयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यमिय्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एक जीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । चतुर्णा क्षपकाणामयोगकेवलिनां च सामान्यवत् । 8116. वेदानुवादेन स्त्रीवेदेषु मिथ्यादृष्टेन नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशत्पल्योपमानि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिध्यावष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहर्तश्च । उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्टयाचप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोरुपशमकयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोः क्षपकयो नाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक दो हजार सागरोपम है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक दो हजार सागरोपम है। तथा शेष गुणस्थानोंका अन्तर पंचेन्द्रियोंके समान है। 8115. योग मार्गणाके अनुवादसे काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलीका नाना जीवों और एक जोवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। चारों क्षपक और अयोगकेवलियोंका अन्तर ओघके समान है। 8116. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदियोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन' पल्योपम है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्बग्मियादृष्टिका नाना जीवोंको अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्योपमका असंख्यातवाँ भाग और अन्तम हर्त है और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्योपम पृथक्त्व है। असंयतसम्यग्दष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तम हर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्योपम पृथक्त्व है। दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तम हर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्योपम पृथक्त्व है। दोनों क्षपकोंका नाना जोवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और 1. पाँच अन्तमहतं कम पचपन पल्य । 2. स्त्रीवेदका उत्कृष्ट काल सो पल्योपम पृथक्त्व है उसमें से दो समय कम कर देनेपर स्त्रीवेदियोंमें सासादन सम्यग्दृष्टिका अन्तर आ जाता है और छह अन्तमहर्त कम कर देनेपर सम्यग्मिध्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है। आगे भी इसी प्रकार आगमानसार घटित कर लेना। चाहिए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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