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________________ --118 8 108] प्रथमोऽध्यायः [47 107. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्टे नाजीवापेक्षया सर्वः कालः। एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणांगुलासंख्येयभागः असंख्येयासंख्येया उत्सपिण्यवसपिण्यः ।। शेषाणां सामान्योक्तः कालः । अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टे नाजीवापेक्षया सर्वः कालः। एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः उत्कर्षेण त्रयः समयाः। सासादनसम्यग्दृष्टयसंयतसम्यग्दृष्टयोनानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः। उत्कर्षेणावलिकाया असंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्येनकः समयः । उत्कर्षेण द्वौ समयौ । सयोगकेवलिनो नानाजीवापेक्षया जघन्येन त्रयः समयाः । उत्कर्षण संख्येयाः समयाः । एकजीवं प्रति जघायश्चोत्कृष्टश्च त्रयः समयाः। अयोगकेवलिनां सामान्योक्तः कालः । कालो वणितः । ___$108. अन्तरं निरूप्यते । विवक्षितस्य गुणस्य गुणान्तरसंक्रमे सति पुनस्तत्प्राप्तेः प्राङमध्यमन्तरम । तद द्विविध सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद मिथ्यादृष्टानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनार्मुहुर्तः । उत्कर्षेण द्वे षट्पष्टी देशोने सागरोपमाणाम् । सासादनसम्यग्दृष्टेरन्तरं नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जवन्येन पत्योपमासंपेयमागः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः। 8107. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तमुहर्त है और उत्कृष्ट काल अंगलके असंख्यातवें भागप्रमाण है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी है। शेष गणस्थानोंका सामान्योक्त काल है। अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवको अपेक्षा जवन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय है। सासादनसम्यग्दष्टि और असंयत सम्यग्दष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल तीन समय और उत्कृष्ट काल दो समय है। सयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल तीन समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल तीन समय है। अयोगकेवलियोंका सामान्योक्त काल है। इस प्रकार कालका वर्णन किया। 8108. अब अन्तरका निरूपण करते हैं । जब विवक्षित गुण गुणान्तररूपसे संक्रमित हो जाता है और पुन: उसकी प्राप्ति होती है तो मध्यके कालको अन्तर कहते हैं। वह सामान्य और विशेषकी अपेक्षा दो प्रकारका है। सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरोपम है। सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय। 1. —ख्येयाः संख्य-मु.। 2. यदि दर्शन मोहनीयका क्षपणा काल सम्मिलित न किया जाय तो वेदक सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल अन्तम हर्त कम छयासठ सागर प्राप्त होता है। साथ ही यह भी नियम है कि ऐसा जीव मध्य में अन्तम हर्तके लिए मिथ गुणस्थानमें जाकर पुनः अन्तम हर्त कम छयासठ सागर तक वेदक सम्यक्त्वके साथ रह सकता है । इसके बाद वह या तो मिथ्यात्वमें चला जाता है या दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करने लगता है । यहाँ मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर लाना है इसलिए मिथ्यात्वसे लाकर अन्तमें पुनः मिथ्यात्वमें ही ले जाना चाहिए। इससे मिथ्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक सौ बत्तीस सागर प्राप्त हो जाता है। 3. यदि सासादन सम्यग्दृष्टि न हों तो वे कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवें भाग काल तक नहीं होते इसीसे इनका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण बतलाया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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