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________________ 46] सर्वार्थसिद्ध [118 § 103कि तु संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । कालः । $ 104. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवापेक्षया द्वौ भङ्गौ अनादिः सपर्यवसानः सादिः सपर्यवसानश्च । तत्र सादिः सपर्यवसानो जघन्ये नान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गल परिवर्तो देशोनः । सासादनसम्यग्दृष्टयद्ययोगकेवत्यन्तानां सामान्योक्तः कालः । अभव्यानामनादिरपर्यवसानः । 8105. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टी नामसंयतसम्यग्दृष्टाद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्योक्तः कालः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टीनां चतुर्णां सामान्योक्तः कालः । औपशमिकसम्यक्त्वेषुअसंयत सम्यग्दृष्टिसंयत । संयतयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्यश्चोत्कृष्टइचान्तर्मुहूर्तः । प्रमताप्रमतयोश्चतुर्णामुपशमकानां च नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । सासादनसभ्यग्दृष्टिसम्यङ्गमिथ्यादृष्टिमिथ्यादृष्टीनां सामान्योक्तः कालः । 8106. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां पुंवेदवत् । शेषाणां सामान्योक्तः । 'असंज्ञिनां नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । 'उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्ताः । तदुभयव्यपदेश रहितानां सामान्योक्तः । का सामान्योक्त काल है । किन्तु संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । § 104. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्यों में मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा संब काल है । एक जीवकी अपेक्षा दो भंग हैं अनादि - सान्त और सादि - सान्त । इनमेंसे सादि- सान्त भंगकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन है । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है । अभव्योंका अनादि - अनन्त काल है । । 8105. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है । चारों क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंका सामान्योक्त काल है । औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृट काल पल्योपमका असंख्यातवाँ भाग है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और चारों उपशमकोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । तथा सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टिका सामान्योक्त काल है । 8106. संज्ञा मार्गणा अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येकका काल पुरुषवेदियोंके समान है । तथा शेष गुणस्थानोंका सामान्योक्त काल है । असंज्ञियों का नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है । संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंका सामान्योक्त काल है 1. - ज्ञिनां मिथ्यादृष्टेर्नाना मु. 1 2 ग्रहणम् । तिष्णिसया छत्तीसा छावट्ठी सहस्साणि मरणाणि । अन्तोमुहुत्तमेत तावदिया चेव होंति खुद्द भवा । 66336 । उत्क—मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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