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________________ -115522] प्रथमोऽध्यायः नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ।।5।। 822. अतद्गुणे वस्तुनि संव्यवहारार्थ 'पुरुषकारान्तियुज्यमानं संज्ञाकर्म नाम । काष्ठपुस्तचित्रकर्माशनिक्षेपादिष सोऽयमिति स्थाप्यमाना स्थापना । गुणैर्गुणान्वा तु तं गतं गुणोष्यते गणान्तोष्यतीति वा द्रव्यम् । वर्तमानतत्पर्यायोपलक्षितं द्रव्यं भावः। तद्यथा, नामजीवः स्थापनाजीवो ध्यजीवो भायजीव इति चतुर्धा जीवशम्दार्थो न्यस्यते। जीवनगुणमनपेक्ष्य यस्य कस्यचिन्नाम नियमाणं नाम जीवः । अक्षनिक्षेपादिषु जीव इति वा मनुष्यजीव इति वा व्यवस्थाप्यमानः स्थापनाजीवः । द्रव्यजीवोः द्विविधः आगमद्रव्यजीवो नोआगमद्रव्यजीवश्चेति । तत्र जीवप्राभूतज्ञायो मनुष्यजीवप्राभुतज्ञायो वा अनुपयुक्त आत्मा आगमद्रव्यजीवः । नोआगमद्रव्यजीवस्त्रेधा व्यवतिष्ठते ज्ञायकशरीरभावि-तद्व्यतिरिक्तभेदात् । तत्र ज्ञातुर्यच्छरीरं त्रिकालगोचरं तज् ज्ञायकशरीरम् । सामान्यापेक्षया नोआगमभाविजीवो नास्ति, जीवनसामान्यस्य सदापि विद्यमानत्वात् । विशेषापेक्षया त्वस्ति । गत्यन्तरे जीवो व्यवस्थितो मनुष्यभव प्राप्ति प्रत्यभिमुखो मनुष्यभाविमोवः । तद्व्यतिरिक्तः कर्मनोकर्मविकल्पः । भावजीवो द्विविधः आगमभावजीवो नोआगमभावबीवश्चेति । तत्र जीवप्राभृतविषयोपयोगाविष्टो मनुष्यजीवप्राभृतविषयोपयोगयुक्तो वा आत्मा आमभावजीवः । जीवनपर्यायेण मनुष्यजीवत्वपर्यायेण वा समाविष्ट आत्मा नोआरामभावजीवः। एवमितरेषामपि पदार्थानां नामादिनिक्षेपविधिनियोज्यः। स किमर्थः ? अप्रकृतनिराकरणाय नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव रूपसे उनका अर्थात् सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदिका न्यास अर्थात् निक्षेप होता है ।।5।। 5 22. संज्ञाके अनुसार गुणरहित वस्तुमें व्यवहारके लिए अपनी इच्छासे की गयी संज्ञाको नाम कहते हैं । काष्ठकर्म, पुस्तकर्म, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेप आदिमें वह यह है' इस प्रकार स्थापित करनेको स्थापना कहते हैं । जो गुणोंके द्वारा प्राप्त हुआ था था गुणोंको प्राप्त हुआ था अथवा जो गुणोंके द्वारा प्राप्त किया जायेगा या गुणोंको प्राप्त होगा उसे द्रव्य कहते हैं । वर्तमान पर्यायसे युक्त द्रव्यको भाव कहते हैं। विशेष इस प्रकार है--नामजीव, स्थापना-जीव, द्रस्यजीव और भावजीव, इस प्रकार जीव पदार्थका न्यास चार प्रकारसे किया जाता है। जीवन गुणकी अपेक्षा न करके जिस किसीका 'जीव' ऐसा नाम रखना नामजीव है। अक्षनिक्षेप आदिमें यह 'जीव है या 'मनुष्य जीव है' ऐसा स्थापित करना स्थापना-जीव है। द्रव्यजीवके दो भेद है-आगम द्रव्यजीव और नोआगम द्रव्यजीव। इनमें से जो जीवविषयक या मनुष्य जीवविषयक शास्त्रको जानता है किन्तु वर्तमानमें उसके उपयोगसे रहित है वह आगम द्रव्यजीव है। नोबागम द्रव्यजीवके तोन भेद हैं--ज्ञायक शरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त। ज्ञाताके शरीरको ज्ञायक शरीर कहते हैं। जीवन सामान्यकी अपेक्षा 'नोआगम भाविजीव' यह भेद नहीं बनता, क्योंकि जीवनसामान्यकी अपेक्षा जीव सदा विद्यमान है । हाँ, पर्यायाथिक नयकी अपेक्षा 'नोआगम भाविजीव' यह भेद बन जाता है, क्योंकि जो जीव दूसरी गतिमें विद्यमान है वह जब मनुष्य भवको प्राप्त करनेके लिए सम्मुख होता है तब वह मनुष्य भाविजीव कहलाता है। तदव्यतिरिक्तके दो भेद हैं-कर्म और नोकर्म। भावजीवके दो भेद हैं-आगम भावजीव और नोआगम भावजीव। इनमें से जो आत्मा जीवविषयक शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है अथवा मनुष्य जीवविषयक शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है वह आगम भाव जीव है। तथा जीवन पर्याय या मनुष्य जीवन पर्यायसे युक्त आत्मा नोआगम भाव 1. पुस्खाका- मु. । 2. --ध्यभाव- आ., दि. 2 । 3. नामजीवानां नामा-- मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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