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________________ 106] 323 सत्य और भाषा समितिमें अन्तर का कथन ये दस धर्म संवरके कारण कैसे हैं इसको विचार 324 अनुप्रेक्षा बारह भेद 324 अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्तन करने की प्रक्रिया निर्जरा के दो भेद व उनकी व्याख्या ये अनुप्रेक्षाएँ संवर का कारण कैसे हैं इसका विचार अनुप्रेक्षा को संवरके हेतुओंके मध्यमें रखनेका प्रयोजन परीषह की निरुक्ति व प्रयोजन परीषहजय संवर और निर्जराका कारण कैसे है. इसका विचार परीषहोंके नाम जिनके ग्यारह परीषह होते हैं इस बात का निर्देश जिनके ग्यारह परीषह किनिमित्तक होते हैं इस बातका निर्देश जिनके मोहनीयका उदय न होनेपर भी ग्यारह परीषह क्यों कहे हैं इस बातका निर्देश सर्वार्थसिद्धि 'न सन्ति' पद के अध्याहारकी सूचना बादरसाम्पराय के सब परीषह होते हैं इस बात का निर्देश क्षुधादि बाईस परीयों को किस प्रकार जीतना चाहिए इसका पृथक्-पृथक् विचार 330 पूर्वोक्त विधि से परीषहों को सहन करने से संवर होता है इसका निर्देश 336 बादरसाम्परायशब्द का अर्थ किन चारित्रों में सब परीषह सम्भव हैं इस बात का निर्देश ज्ञानावरणके उदय में जो दो परीग्रह होते हैं उनका निर्देश 324 327 337 सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थ वीतराग के चौदह परीषह होते हैं इस बात का निर्देश सूक्ष्मसाम्पराय जीवके मोहोदयनिमित्तक परीषह क्यों नहीं होते इस शंका का परिहार पूर्वोक्त जीवोंके ये चौदह परीषह किस अपेक्षासे होते हैं इस बात का विचार 337 337 Jain Education International 328 329 329 329 330 337 337 338 338 339 339 339 340 ज्ञानावरण के उदयमें प्रज्ञा परीवह कैसे होता है इसका विचार दर्शनमोह और अन्तरायके उदय में जो परिषह होते हैं उनका निर्देश चारित्रमोह के उदय में जो परीवह होते हैं उनका निर्देश निषद्यापरीपह चरित्रमोहके उदय में कैसे होता है इसका विचार वेदनीयके उदय में जो परीषह होते हैं इसका विचार एक जीवके एक साथ कितने परीषह होते हैं इसका विचार एक जीव के एक साथ उन्नीस परीयह क्यों होते हैं इसका विचार प्रज्ञा और अज्ञान परीपह एक साथ कैसे होते हैं इसका विचार चारित्रके पाँच भेद चारित्रको अलग ग्रहण करने का प्रयोजन सामायिकचारित्रके दो भेद और उनकी व्याख्या छेदोपस्थापनाचारित्रका स्वरूप परिहारविशुद्धिचारित्र का स्वरूप सूक्ष्मसाम्पराय चारित्र का स्वरूप अथाख्यातचारित्रका स्वरूप व अथ शब्दकी सार्थकता अथाख्यातका दूसरा नाम यथाख्यात है इस बातका सयुक्तिक निर्देश 'इति' शब्द की सार्थकता सामायिक आदिके आनुपूर्वी कचनकी सार्थकता बाह्य तपके छह भेद अनशन आदि की व्याख्या व उसके कथन का प्रयोजन परीषह और कायक्लेश में क्या अन्तर है इस बातका निर्देश बाह्य तप कहनेका प्रयोजन अन्तरंग तपके छह भेद प्रायश्वित आदि की व्याख्या ध्यान को छोड़कर शेष पाँच अन्तरंग तपों के अवान्तर भेद For Private & Personal Use Only 340 340 341 341 342 342 342 342 343 343 343 343 343 343 343 344 344 344 345 345 345 345 346 346 346 www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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