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________________ 312 316 317 विषयानुक्रमणिका [105 दर्शनमोहनीय के तीन भेदोंका कारण व उनकी मूल प्रकृतियों का स्वमुख से अनुभव 311 व्याख्या 300 कुछ कर्मोको छोड़कर उत्तर प्रकृतियोंका चारित्रमोहनीय के सब भेदों की व्याख्या 301 परमुख से भी अनुभव होता है 312 आयुकर्मके चार भेद 303 अपने कर्म के नामानुसार अनुभव होता है 312 आयुव्यपदेशवा कारण व चारों आयुओंकी कर्मफल के बाद निर्जरा होती है 312 व्याख्या 303 निर्जरा व उसके भेदों की व्याख्या नामकर्मके अवान्तर भेद 303 'च' पद की सार्थकता 312 गति व उसके भेदोंकी व्याख्या 303 विशेषार्थ द्वारा अनुभागबन्धका विशेष विवरण 313 जाति व उसके भेदोंकी व्याख्या 304 प्रदेशबन्ध की व्याख्या 315 शरीर नामकर्म व उसके भेदों की व्याख्या 304 पुण्य प्रकृतियाँ 316 अंगोपांग व उसके भेदों की व्याख्या 304 पुण्य प्रकृतियों के नाम निर्माण व उसके भेदों की व्याख्या 304 पाप प्रकृतियाँ 317 बन्धन की व्याख्या 304 पाप प्रकृतियों के नाम संघातकी व्याख्या 304 संस्थान व उसके छह भेदों की व्याख्या 304 नौवाँ अध्याय संहनन व उसके छह भेदोंकी व्याख्या 304 स्पर्शादिक बीस की व्याख्या 305 संवर का स्वरूप 318 आनुपूर्व्य व उसके चार भेदोंकी व्याख्या 305 संवर के दो भेद व उनके लक्षण 318 पूर्वोक्त भदोंके सिवा अन्य भेदोंकी व्याख्या 306 किस गुणस्थान में किस निमित्त से कितनी गोत्र कर्मके दो भेद 307 प्रकृतियों का संवर होता है 318 उच्च व नीच गोत्रकी व्याख्या संवर के हेतु 320 अन्तराय कर्मके पाँच भेद गुप्ति, समिति, धर्म, अनूप्रेक्षा और परीषहदानान्तराय आदिके कार्य जयका स्वरूप 321 सूत्रमें आए हुए 'सः' पदकी सार्थकता आदि के तीन कर्म व अन्तराय कर्मका उत्कृष्ट 321 संवर और निर्जराके हेतुभूत तपका निर्देश स्थितिबन्ध 309 321 तपका धर्ममें अन्तर्भाव होता है फिर भी इन कर्मों के उत्कृष्ट स्थितिबन्ध का स्वामी 309 उसके अलग से कहने का कारण मोहनीय कर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध 309 321 तप अभ्युदय स्वर्गादिका कारण होकर भी मोहनीयके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी 309 निर्जराका कारण कैसे है इस शंका का नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध 309 समाधान इन कर्मोके उत्कृष्ट स्थितिबन्ध का स्वामी 309 321 गुप्तिका स्वरूप 322 आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध 310 निग्रह पद की व्याख्या आयुकर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी 322 310 सम्यक् पदकी सार्थकता वेदनीय कर्म का जघन्य स्थितिबन्ध 322 310 गुप्ति संवरका कारण कैसे है इस बातका निर्देश 322 नाम और गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध 310 समिति के पाँच भेद 322 शेष कर्मों का जघन्य स्थितिबन्ध 311 समिति संक्रका हेतु कैसे है इस बात का निर्देश 323 अनुभागबन्धकी व्याख्या 311 धर्म के दस भेद 323 विपाकपदकी व्याख्या 311 गुप्ति, समिति और धर्मको संवरका हेत अनुभवके दो भेद 311 कहने का प्रयोजन 323 अनुभवकी दो प्रकार से प्रवृत्ति 311 क्षमादि दस धर्मोका स्वरूप 323 307 308 308 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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