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________________ 104] सम्पदृष्टिके पांच अतिचार प्रशंसा और संस्तवमें अन्तर सम्यग्दर्शनके आठ अंग होने पर पाँच अतिचार ही क्यों कहे इसका कारण यतों और शीलों में पाँच-पाँच अतिचारोंको चलानेवाला अधिकार सूत्र अहिंसाणुव्रत के पांच अतिचार बन्ध आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या सत्याव्रत के पांच अतिचार मिथ्योपदेश आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या अचौर्याणुव्रत के पांच अतिचार स्तेनप्रयोग आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या स्वदारसन्तोष व्रतके पाँच अतिचार परविवाहकरण आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या परिग्रहपरिमाण व्रतकें पाँच अतिचार दिविरमणव्रतके पांच अतिचार ऊर्ध्वव्यतिक्रम आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या देशविरमण व्रतके पाँच अतिचार खुलाखा 'स्व' शब्दका अर्थ दानमें विशेषता लानेके कारण विधिविशेष शब्दका अर्थ विधिविशेष आदिका खुलांसा सर्वार्थसिद्धि 282 282 Jain Education International 282 आनयन आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या अनर्थदण्डविरतिव्रत के पाँच अतीचार कन्दर्प आदि प्रत्येक पदकीं व्याख्या सामायिकके पांच अतीचार 287 287 287 योगदृष्य विधान आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या 287 प्रोषधोपवासके पांच अतिचार अप्रत्यवेक्षित आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या भोगोपभोगपरिसंख्यानव्रतके पाँच अतिचार सचित्त आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या अतिथिसंविभाग शीलके पाँच अतिचार अतिनिक्षेप आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या सल्लेखनाके पाँच अतिचार जीविताशंसा आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या 284 285 285 285 286 मिथ्यादर्शनके दो भेद और उनकी व्याख्या 282 परोपदेशनिमित्त मिथ्यादर्शनके चार या पाँच 283 भेद व उनका खुलासा 283 क्रियावादी आदिके अवान्तर भेद 283 अविरतिके 12 भेद 283 कषायके 25 भेद 284 मनोयोग आदिके अवान्तर भेद प्रमादके अनेक भेद किस गुणस्थान में कितने बन्धके हेतु हैं इसका विचार बन्धकी व्याख्या दान पदकी व्याख्या अनुग्रह पदका अर्थ स्वोपकार क्या है और परोपकार क्या है इसका 'सफपायत्वात्' पद देनेका प्रयोजन 286 'जीव' पद देनेका प्रयोजन 286 286 'कर्मणों योग्यान्' इस प्रकार निर्देश करनेका प्रयोजन 286 दृष्टान्तपूर्वक कर्मरूप परिणमन का समर्थन 'स' पदकी सार्थकता 286 बन्धके चार भेद 288 288 288 288 288 288 प्रकृतिबन्धके आठ भेद 289 289 आठवाँ अध्याय बन्धके हेतु प्रमाद पदकी व्याख्या 289 289 289 289 289 आवरण पदकी व्याख्या वेदनीय आदि प्रत्येक पदकी व्युत्पत्ति' प्रकृतिबन्धके आठ भेदों के अवान्तर भेद ज्ञानावरण के पांच भेद 293 293 294 294 प्रकृति आदि प्रत्येक पदकी दृष्टान्तपूर्वक व्याख्या 294 प्रकृति और प्रदेशबन्धका कारण योग है तथा स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धका कारण कषाय है इस बातका निर्देश अभव्यते मनः पर्यय और केवलज्ञान शक्ति किस अपेक्षा है भव्य और अभव्य विकल्पका कारण दर्शनावरणके नौ भेद निद्रा आदि पाँचोंकी व्याख्या वेदनीयके दो भेद सद्बद्य और असद्वेद्य की व्याख्या मोहनीय के 28 भेद For Private & Personal Use Only 291 291 291 291 292 292 292 292 292 292 293 293 293 295 296 296 296 297 297 297 298 298 299 299 299 300 www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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