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________________ विषयानुक्रमणिका [103 अनुवीचीभाषण पदका अर्थ 266 मूर्छाको परिग्रह मानने पर बाह्य पदार्थ परिग्रह अचौर्यव्रतकी पांच भावनाएँ 266 कैसे हैं इस बातका विचार 274 प्रत्येक पदकी व्याख्या 267 व्रतीका स्वरूप 275 ब्रह्मचर्य व्रतकी पाँच भावनाएँ 267 शल्य पदकी व्याख्या व उसके भेद 275 परिग्रहत्याग व्रतकी पाँच भावनाएँ 267 शल्य के तीनों भेदों की व्याख्या 275 हिसादिकमें अपाय और अवद्यदर्शनका उपदेश 268 निःशल्यको व्रती कहने का प्रयोजन 275 हिंसादिक कैसे अपाय और अवद्य हैं इसका व्रतीके दो भेद 276 विस्तारसे विवेचन 268 अगार पदका अर्थ 276 हिंसादिक दुःख ही हैं इस भावनाका उपदेश 268 मुनिके शून्य अगार आदिमें रहने पर अगारीहिंसादिक दुःख कैसे हैं इसका विस्तारसे विवेचन 269 पन प्राप्त होता है और गृहस्थके घर छोड़' लोककल्याणकारी मैत्री आदि चार भावनाएँ 269 देने पर अनगारीपन प्राप्त होता है इस शंकाका मैत्री आदि पदकी व्याख्या 270 परिहार 276 संवेग और वैराग्यके लिए जगत और कायके अगारीके पूरे व्रत नहीं होने से वह व्रती कैसे है स्वभावका चिन्तन 270 इस बातका विचार 276 लोकका आकार 270 अगारीकी व्याख्या 277 जगत् और कायके स्वभावका किस प्रकार अगारीके व्रतोंको अणु कहने का प्रयोजन 277 विचार करे 270 अगारी किस प्रकारकी हिंसाका त्यागी होता है 277 हिसाकी व्याख्या 271 अहिंसा आदि पाँचों अणुव्रतों की व्याख्या 277 प्रमत्तयोगपदकी सार्थकता 271 अगारी अन्य किन गुणोंसे सम्पन्न होता है । प्राणोंका वियोग न होने पर हिंसा होती है इसका विचार 278 इस बातका उल्लेख 271 दिग्विरतिव्रतकी व्याख्या 278 अनृतकी व्याख्या 272 देशाविरति व्रतकी व्याख्या असत् और अनृत पदकी व्याख्या 272 अनर्थदण्डका अर्थ हिंसाकर वचन ही अनृत है इस बातका अनर्थदण्डके पाँच भेद और उनकी व्याख्या 278 खुलासा 272 सामायिक की व्याख्या 279 स्तेयकी व्याख्या 272 प्रोषध व उपवास शब्दका अर्थ 279 आदान पदका अर्थ 272 प्रोषधोपवासकी व्याख्या 279 कर्म और नोकर्मका ग्रहण स्तेय क्यों नहीं है उपभोगपरिभोगकी व्याख्या 280 इसका विचार 273 मधु आदिके सप्रयोजन त्यागका उपदेश 280 भिक्षुके भ्रमण करते समय रथ्याद्वार में प्रवेश केतकी आदिके फूल व साधारण वनस्पति के । करनेसे चोरी क्यों नहीं होती इसका विचार 273 सप्रयोजन त्यागका उपदेश - 280 अब्रह्मकी व्याख्या 273 यान वाहन आदिके परिमाण करनेका उपदेश 280 मिथुन पदका अर्थ 273 अतिथि पदकी व्याख्या सब कर्म मैथुन क्यों नहीं है इसका खुलासा 273 अतिथिसं विभागके चार भेद 280 ब्रह्म पदकी व्याख्या 274 गृहस्थका सल्लेखना धर्म 280 परिग्रहकी व्याख्या 274 मरण पदकी व्याख्या मूर्छा पदका अर्थ 274 सल्लेखना पदका अर्थ 280 मूळ पदसे वातादि प्रकोपजन्य मूच्छीका ग्रहण सूत्र में 'जोषिता' पद रखनेका कारण . .. 281 क्यों नहीं किया इस बातका खुलासा 274 सल्लेखना आत्मवध नहीं है इस बातका समर्थन 281 278 278 280 280 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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