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________________ 96] सर्वार्थसिद्धि 146 संज्ञी जीवोंका स्वरूप 132 वैक्रियिक और आहारक शरीरको अप्रतीधात समनस्क पद देने की सार्थकता 132 क्यों नहीं कहा 1411 विग्रहगतिमें जीव की गति का कारण 132 तैजस और कार्मणका अनादिसम्बन्ध 141 विग्रह कर्म व योग शब्दका अर्थ 133 'च' पदकी सार्थकता 141 गतिका नियम 133 तैजस और कार्मणके स्वामी 142 श्रेणि शब्दका अर्थ 133 एक जीवके एक साथ लभ्य शरीरोंकी संख्या 142 गतिपदकी सार्थकता 134 कार्मण शरीरकी निरुपभोगता "143 काल और देशनियम का विधान 134 उपभोग पदका अर्थ 143 विग्रह शब्दका अर्थ 134 तैजस शरीर भी निरुपभोग है फिर उसका 'अविग्रहा जीवस्य' सूत्रकी सार्थकता 134 ग्रहण क्यों नहीं किया 143 संसारी जीवकी गति का नियम और समय 134 औदारिक शरीर किस-किस जन्मसे होता है 144 निष्कुटक्षेत्रसे मरकर निष्कुटक्षेत्र में उत्पन्न वैक्रियिक शरीर किस जन्मसे होता है 144 होनेवाले जीवकी त्रिविग्रह गति 135 वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है 144 अविग्रहवाली गति का समय-निर्देश 135 तेजसशरीर लब्धिप्रत्यय होता है 144 अनाहारक जीवोंका समय-निर्देश 135 आहारक शरीरकी विशेषता और स्वामी 145 आहार शब्दका अर्थ 136 शुभ आदि पदोंका अर्थ 145 जन्मके भेद 136 आहारक शरीरकी उत्पत्तिका प्रयोजन 145 सम्मूर्छन, गर्भ और उपपाद पदका अर्थ 136 नारक और सम्मूच्छिनोंके वेद का वर्णन 146 चौरासी लाख योनियां किसके कितनी होती हैं 136 नारक शब्दका अर्थ योनियोंके भेद 136 देवोंके वेदका वर्णन 146 सचित्त आदि पदों का अर्थ 136 शेष जीवोंके वेद का वर्णन 147 'तत्' पदकी सार्थकता 137 लिंग के दो भेद व उनका अर्थ 147 योनि और जन्ममें अन्तर 137 स्त्री आदि शब्दोंको व्युत्पत्ति 147 किस जीवके कौन योनि होती है इसका खुलासा 137 अनपवायुष्क जीवोंका निरूपण 147 गर्भ जन्म के स्वामी 138 औपपादिक आदि पदोंका अर्थ 148 जरायु आदि पदों का अर्थ 138 पाठान्तरका निर्देश 148 उपपाद जन्मके स्वामी 138 तीसरा अध्याय सम्मूर्छन जन्मके स्वामी 139 नरककी सात भूमियाँ व उनका आधार 150 जन्मके भूस्वामियों के प्रतिपादक तीनों सूत्र रत्नप्रभा आदि नामोंकी सार्थकता 150 नियमार्थक हैं 139 'भूमि' पदकी सार्थकता 151 शरीरके पाँच भेद 139 भूमि, तीन वातवलय और आकाश इनमें औदारिक आदि पदोंका अर्थ 139 आधार-आधेयभाव शरीरों में उत्तरोत्तर सूक्ष्मता 140 सप्त पदकी सार्थकता 151 तेजससे पूर्व तीन शरीर उत्तरोत्तर प्रदेशोंकी 140 विशेषार्थ द्वारा अधोलोकका स्पष्टीकरण 151 अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं 140 भूमियोंमें नरकों (विलों) की संख्या 152 गुणकारका प्रमाण 140 भूमियोंमें नरक प्रस्तारों का विचार अन्तके दो शरीर अनन्तगुणे हैं 141 नारक निरन्तर अशुभतरलेश्या आदिवाले तैजस और कार्मण शरीरकी अप्रतीघातता 141 होते हैं इसका विचार 153 प्रतीघात पद का अर्थ 141 नित्य शब्द का अर्थ 151 153 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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