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________________ विषयानुक्रमणिका [95 123 124 व्यवहारनयका स्वरूप 101 उपयोग के भेदोंका स्वरूप व प्रवृत्तिक्रमका ऋजुसूबनयका स्वरूप 102 निर्देश 117 शब्दनयका स्वरूप 102 जीवों के भेद 118 समभिरूढनयका स्वरूप 103 संसार शब्द का अर्थ 119 एवम्भूतनयका स्वरूप 103 द्रव्यपरिवर्तनका स्वरूप 119 नयोंका पारस्परिक सम्बन्ध और उत्तरोत्तर क्षेत्र परिवर्तनका ,, 119 विषय की सूक्ष्मता 104 काल परिवर्तनका , 120 विशेषार्थ द्वारा नयोंका स्पष्टीकरण 104 भव परिवर्तनका , 120 भाव परिवर्तनका, 121 दूसरा अध्याय संसारी जीवोंके भेद जीवके असाधारण भावोंका निरूपण 107 मन के दो भेद तथा समनस्क और अमनस्क उपशम आदि का अर्थ 107 शब्दका अर्थ 123 औपशमिकादि भावोंके क्रमकी सार्थकता 107 संसारी जीवोंके प्रकारान्तरसे भेद 123 भावोंके भेदोंकी संख्या 108 सूत्र में संसारी पद देनेकी सार्थकता 123 द्विनवाष्टादिपदका भेद शब्दके साथ दो प्रस और स्थावर शब्दका आगमिक अर्थ 124 प्रकारका समास 108 स्थावर जीवोंके भेद 124 औपशमिक भाव के दो भेद 109 स्थावर शब्द का अर्थ 124 औपशमिक सम्यक्त्व किस प्रकार उत्पन्न पथिवी, पथिवीकाय, पृथिवीकायिक और होता है 109 पृथिवीजीवका स्वरूप काललब्धिका वर्णन 109 स्थावर जीवोंके प्राण 124 औपशमिकचारित्र किस प्रकार उत्पन्न त्रस जीवोंके भेद 125 होता है 110 द्वीन्द्रिय आदि शब्दों का अर्थ नायिकभावके नौ भेद 110 द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके प्राण नौ क्षायिक भावोंका स्वरूप व उनका कार्य 110 इन्द्रियोंकी संख्या 126 क्षायिक दानादि कृत अभयदानादि सिद्धोंके इन्द्रियोंमें कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण नहीं होता 127 क्यों नहीं होते इसका कारण 111 इन्द्रियोंके दो भेद 127 क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद 112 द्रव्येन्द्रियके दो भेद 127 क्षायोपशमिक भावके अठारह भेदों का स्वरूप 112 निर्वति और उपकरणका अर्थ व इनके भेद 127 औदयिक भावके इक्कीस भेद 114 भावेन्द्रियके दो भेद 127 औदयिक भावके भेदों का स्वरूप 114 लब्धि और उपयोगका अर्थ 127 उपशान्तकषाय आदिमें शुक्ललेश्या किस उपयोगको इन्द्रिय कहनेका कारण प्रकार मानी गयी है इसका निर्देश 115 पांच इन्द्रियोंके विषय पारिणामिक भावके तीन भेद 115 कर्मसाधन और भावसाधन द्वारा अस्तित्वादि अन्य भी पारिणामिक भाव हैं फिर स्पर्शादिकी सिद्धि 129 उनका ग्रहण क्यों नहीं किया इस शंका मनका विषय 130 का समाधान 115 श्रुत शब्द के दो अर्थ 130 विशेषार्थ द्वारा पारिणामिक भावों का खुलासा 116 वनस्पति पर्यन्त जीवोंके एक इन्द्रिय होती है 130 जीवका लक्षण 116 स्पर्शन इन्द्रियकी उत्पत्तिका कारण 131 उपयोगका स्वरूप 117 कृमि आदिजीवों के दो आदि इन्द्रियाँ होती हैं 131 उपयोग के भेद-प्रभेद 117 किस क्रमसे इन्द्रियाँ बढ़ी हैं उनका नामनिर्देश 131 125 125 128 129 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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