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________________ 159 ह विषयानुक्रमणिका [97 किस भूमिमें कौन लेश्या है इसका विचार 153 हिमदान आदि नाम अनिमित्तक और द्रव्यलेश्या और भावलेश्याका काल 153 अनादि हैं .159 नारकियोंके देहका विचार व देह की ऊँचाई 153 हिमवान आदिको वर्षधर पर्वत कहने का नारकियों के तीव्र वेदनाका कारण 153 कारण नारकोंमें उष्णता व शीतताका विचार 153 कौन पर्वत कहाँसे कहाँ तक अवस्थित है व उनकी नारकी स्वभावसे अशुभ विक्रिया करते हैं ऊँचाई और अवगाह क्या है इसका विचार 159 और अशुभ निमित्त जोड़ते हैं 153 पर्वतोंका रंग 160 नारको आपस में दुःखके कारण होते हैं 154 पर्वतोंकी विशेषता व विस्तार 160 परस्पर दुःख उत्पन्न करने के कारणों का निर्देश 154 'च' पद की सार्थकता 160 नारकियोंकी विक्रियासे ही तलवार,बरछी पर्वतोंपर तालाब 160 आदि बनते हैं 154 प्रथम तालाबका आयाम व विस्तार 161 तीसरी भूमि तक असुरोंके निमित्तसे दुःख प्रथम तालाबका अवगाह 161. की उत्पत्ति 154 प्रथम तालाबके कमलका प्रमाण 161 असुर शब्दका अर्थ . 155 प्रथम तालाब में कमल के अवयवोंका प्रमाण असुरोंके संक्लिष्ट विशेषणकी सार्थकता 155 व जलतलसे कमलकी ऊँचाईका प्रमाण 161 कुछ अम्बावरीष आदि देव ही दुःख में अन्य तालाब व कमलोंका प्रमाण 161 निमित्त होते हैं इसका निर्देश 155 कमलोंमें निवास करनेवाली छह देवियों व सूत्रमें आये हुए 'च' पदकी सार्थकता ___ 155 उनका परिवार और आयु 162 नारकियोंके अकालमरण न होने का कारण 155 कमलोंकी कणिकाके बीच में बने हुए प्रासादों नारकियोंकी उत्कृष्ट आयु . 155 का प्रमाण व रंग 162 'सत्त्वानाम' पदकी सार्थकता 156 मुख्य कमलोंके परिवार, कमलोंमें रहनेवाले तिर्यग्लोक पदका अर्थ 156 अन्य देव 162 द्वीपों और समुद्रोंके मुख्य-मुख्य नामोंका निर्देश 16 पूवोंक्त क्षेत्रों में बहनेवाली चौदह नदियाँ 162 द्वीपों और समुद्रों के अनेक नामों का निर्देश 156 पूर्व समुद्रको जानेवाली नदियाँ 163 द्वीपों और समुद्रोंका विष्कम्भ और आकृति 157 पश्चिम समुद्रको जानेवाली नदियाँ 163 सूत्रमें आये हुए प्रत्येक पदकी सार्थकता 157 कौन नदी किस तालाबके किस ओरके द्वारसे जम्बूद्वीपका सन्निवेश और व्यास 157 निकली है इसका विचार जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण 157 गंगा और सिन्धु आदि नदियों की परिवार जम्बवृक्षकी अवस्थिति कहाँ है और वह नदियाँ किस रूप है इसका विचार 157 सूत्र में गंगा और सिन्धु दोनों पदोंके रखने विशेषार्थ द्वारा मध्यलोक और सुमेरु पर्वत की सार्थकता का वर्णन 157 भरतक्षेत्रका विस्तार 164 सात क्षेत्रोंकी संज्ञा 158 विदेह पर्यन्त आगेके पर्वतों व क्षेत्रोंका भरत आदि संज्ञाएँ अनिमित्तक और विस्तार 165 अनादि हैं 158 उत्तरके क्षेत्र व पर्वतोंके विस्तारका प्रमाण 165 कौन क्षेत्र कहाँ पर है इसका विचार 158 भरत और ऐरावत क्षेत्रमें कालकृत परिवर्तन 165 यह परिवर्तन क्षेत्रका न होकर वहाँके जीवोंसात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह का होता है 165 कूलाचल पर्वत 159 यह परिवर्तन अनुभव, आयु और प्रमाणादि ये पर्वत कहाँ से कहाँ तक फैले हुए हैं . 159 कृत होता है 166 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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