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________________ ७२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [पदेसविहत्ती ५ ११४. मणुसगदीए मणुस्साणमोघं। मणुसपज्जा एवं चेव । णवरि इथिवेद. जम्हि जम्हि भणदि तम्हि णियमा अज० असंखे०भागब्भहिया । इथिवेद० जह. पदे०विहत्तिओ णवंस सिया अत्थि सिया पत्थि । जदि अत्थि णियमा अज० असंखे०गुणब्भ०। ११५. मणुसिणीसु ओघं । वरि पुरिसवेद-णसयवेद० जम्हि जम्हि भणदि तम्हि तम्हि णियमा अज० असंखे०भागब्भ० । णवूस० जह० पदे विहत्तिओ इत्थिवेद० किं जहण्णा किमजहण्णा १ णियमा अज. असंखे०गुणब्भ०। पूरिसवेद. जह० पदे वित्तिओ एक्कारसक०-इत्थिवेद० णियमा अज. असंखे०गुणब्भ० । लोभसंज०-सत्तणोक० णियमा अज० असंखे भागभ० । एत्थ लोभसंजलण-पुरिसवेदाणमधापवत्तकरणचरिम समए जहण्णसामित्ते अवसिह संते तेसिमण्णोण्णं पेक्खियूण तं तु विहाणपदिदा त्ति वत्तव्ये असंखे० भागभहियत्तणियमो किंणिबंधणो त्ति चिंतिय वत्तव्वं । ११६. देवगदीए देवाणं तिरिक्खोघं । भवण-वाण-जोदिसि० पढमपुढविभंगो। सोहम्मीसाणप्पहुडि जावुवरिमगेबज्जो त्ति देवोघो । अणुदिसादि जाव सबसिद्धि त्ति मिच्छ० जह० पदेविहत्तिओ सम्म०-सम्मामि० णियमा तंतु $ ११४. मनुष्यगतिमें मनुष्योंका भङ्ग ओघके समान है। मनुष्य पर्याप्तकोंमें इसी प्रकार है। इतनी विशेषता है कि स्त्रीवेद जहाँ जहाँ कहा जाय वहाँ वहाँ वह नियमसे अजघन्य असंख्यातवां भाग अधिक होता है । स्त्रीवेदकी जघन्य प्रदेशविभक्तिवाले जीवके नपुंसकवेद प्रदेशविभक्ति स्यात् है और स्यात् नहीं है। यदि है तो नियमसे अजघन्य प्रदेशविभक्ति है जो असंख्यातगुणी अधिक होती है। ६ ११५. मनुष्यिनियोंमें ओघके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि पुरुषवेद और नपुंसकवेद प्रदेशविभक्ति जहाँ जहाँ कही जाय वहाँ वहाँ नियमसे अजघन्य असंख्यातवें भाग अधिक होती है। नपुंकवेदकी जघन्य प्रदेशविभक्तिवाले जीवके स्त्रीवेद प्रदेशविभक्ति क्या जघन्य होती है या अजघन्य होती है ? नियमसे अजघन्य असंख्यातगुणी अधिक होती है। पुरुषवेदकी जघन्य प्रदेशविभक्तिवाले जीवके ग्यारह कषाय और स्त्रीवेदकी नियमसे असंख्यातगुणी अजघन्य प्रदेशविभक्ति होती है । लोभसंज्वलन और सात नोकषायोंकी नियमसे असंख्यातवें भाग अधिक अजघन्य प्रदेशविभक्ति होती है । यहाँ पर लोभसंज्वलन और पुरुषवेदका अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें जघन्य स्वामित्व अवशिष्ट रहने पर परस्पर देखते हुए उनकी परस्पर जघन्य प्रदेशक्ति भी होती है और अजघन्य प्रदेशविभक्ति भी होती है। उसमें भी अजघन्य प्रदेश विभक्ति दो स्थान पतित होती है इस प्रकार कथन करने पर असंख्यातवें भाग अधिकका नियम किंनिमित्तक होता है इस बातका विचार कर कथन करना चाहिए। ६ ११६. देवगतिमें देवोंमें सामान्य तिर्यञ्चोंके समान भङ्ग है। भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंमें पहली पृथिवीके समान भङ्ग है। सौधर्म और ऐशान कल्पसे लेकर उपरिम प्रैवेयक तक दोनोंमें सामान्य देवोंके समान भङ्ग है । अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवोंमें -arrowd Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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