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________________ ३७० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ पदेसविहत्ती ५ ॐ णिसेयहिदिपत्तयं णाम किं ? ६०२. सव्वं पि पदेसग्गं णिसेयहिदिपत्तयमेव, णिसेयहिदिमपत्तयस्स कम्मताणुववत्तीदो। तदो किण्णाम तं णिसेयहिदिपत्तयं जं बिसेसेणापुज्वं परूविज्जदि त्ति ? एवंविहासंकासूचयमेदं पुच्छावक्कं । संपहि एदिस्से आसंकाए णिरायरण तस्स सरूवमुत्तरमुत्तेण परूवेइ * कम्म जिस्से हिदीए णिसित्तं प्रोकड्डिदं वा उक्कड्डिदं वा तिस्से चेव हिदीए उदए दिस्सइ तं पिसेयहिदिपत्तयं । ६०३. एवमुक्त भवति-जं कम्मं बंधसमए जिस्से हिदीए णिसित्तमोकड्डिदं वा उक्कडिदं वा संतं पुणो वि तिस्से चेव हिदीए होऊण उदयकाले दीसइ तं णिसेयहिदिपत्तयमिदि । एदं च णाणासमयपबद्धप्पयमेयणिसेयमवलंबिय पयट्टमिदि घेत्तव्वं । कथमेत्थमोकड्डिदमुक्कड्डिदं वा पदेसग्गमुदयसमए तिस्से चेव हिदीए दिस्सइ ति हो जाता है और नीचेकी स्थितिमें स्थित बहुतसे कर्मपरमाणुओंका उत्कर्षण होकर वे अग्रस्थितिमें भी पहुँच जाते हैं। तात्पर्य यह है कि बन्धके समय निषेककी जैसी रचना हुई रहती है उसके अपने उदयको प्राप्त होने तक उसमें बहुत हेरफेर हो जाता है। इससे ज्ञात होता है कि एक समयप्रबद्धके नानानिषेकसम्बन्धी जितने कर्मपरमाणु अग्रस्थितिमें प्राप्त रहते हैं उनका उदय होने पर वे सब उत्कृष्ट स्थितिप्राप्त कहलाते हैं। चूर्णिसूत्रमें आगे जो उत्कृष्ट स्थितिप्राप्त कर्मके स्वामित्वका निर्देश करनेवाला सूत्र है उससे भी इसी बातकी पुष्टि होती है। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थितिप्राप्त कर्म किसे कहते हैं इसका विचार किया। * निषेकस्थितिप्राप्त किसे कहते हैं ? ६.२. जितना भी कम है वह सबका सब निषेकस्थितिप्राप्त ही होता है, क्योंकि जो निषेक स्थितिको प्राप्त नहीं होता वह कर्म ही नहीं हो सकता, इसलिये वह निषेकस्थितिप्राप्त कौनसा कर्म है जिसका विशेष रूपसे यहाँ नये सिरेसे वर्णन किया जा रहा है। इस तरह इस प्रकारकी आशंकाको सूचित करनेवाला यह पृच्छासूत्र है। अब इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये उसका स्वरूप अगले सूत्र द्वारा कहते हैं * जो कर्म जिस स्थिति निक्षिप्त हुआ है अपकर्षित होकर या उत्कर्षित होकर उदयके समय यदि वह उसी स्थितिमें दिखाई देता है तो वह निषेकस्थितिप्राप्त कहलाता है। ६६०३. इस सत्रका यह आशय है कि बन्धके समय जो कर्म जिस स्थितिमें निक्षिप्त हुआ है अपकर्षित होकर या उत्कर्षित होकर फिर भी उदयके समय यदि वह उसी स्थितिमें दिखाई देता है तो वह कर्म निषेकस्थितिप्राप्त कहलाता है। यह सूत्र नाना समयप्रबद्धोंसे सम्बन्ध रखनेवाले एक निषेककी अपेक्षा प्रवृत्त हुआ है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिये। शंका-प्रकृतमें जिन कर्मों का अपकर्षण और उत्कर्षण हुआ है वे कर्म उदय समयमें उसी स्थितिमें कैसे दिखलाई देते हैं ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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