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________________ २४८ जयधवलाहिदे कसायपाहुडे [पदेसविहत्ती मइच्छावणाणिक्खेवाणमेत्युवलंभादो । तदो एदमुक्कड्डणादो अज्झीणहिदियमिदि उवरि सव्वत्थ उक्कड्डणापडिसेहो पत्थि त्ति जाणावण तबिसयमाहप्पमुत्तरमुत्तेण भणइ ॐ जइ दुसमयाहियाए भाषाहाए अणिया कम्महिदी विदिक्कता तिसमयाहियाए वा आवाहाए अणिया कम्महिदी विदिक्कता। एवं गंतूण वासेण वा वासपुधत्तेण वा सागरोवमेण वा सागरोवमपुधत्तेण वा ऊणिया कम्महिदी विदिक्कंता तं सव्वं पदेसग्गं उकडणादो अज्झीणहिदियं । ४३७. एदस्स मुत्तस्स सुगमासेसावयवकलावस्स भावत्थो-पुव्वणिरुदाए समयाहियउदयावलियचरिमहिदीए पदेसग्गस्स बंधसमयप्पहुडि वोलाविय समयाहियजहण्णाबाहादिवरिमासेसमुत्तुत्तवियप्पपरिहीणकम्महिदियस्स' पत्थि उक्कड्डणादो झीणहिदियत्तं । सव्वमेव तमुक्कडडणापाओग्गमिदि सव्वस्स वि एदस्स समयाविरोहेण उक्कड्डिज्जमाणयस्स आवाहमेत्ती अइच्छावणा।णिक्खेवो पुण समयुत्तरादिकमेण वडमाणो गच्छदि जाव उक्कस्साबाहाए समयाहियावलियाए च ऊणसत्तरिसागरोवमकोडाकोडीओ ति । एत्थ सागरोवमपुधत्तेण वा ति एदेण वा सहण अवुत्तसमुच्चय?ण सागरोवमदसपुत्रेण वा सदपुधत्तेण वा सहस्सपुधत्तेण वा लक्खपुधरेण वा कोडिपुधरेण वा अंतोकोडाकोडीए वा कोडाकोडिपुधत्तेण वा ति एदे संभविणो वियप्पा घेत्तव्वा । होना शक्य है, क्योंकि यहां तद्योग्य जघन्य अतिस्थापना और निक्षेप ये दोनों पाये जाते हैं, इसलिये ये कर्मपरमाणु उत्कर्षणसे अझीन स्थितिवाले हैं। अब आगे सर्वत्र उत्कर्षणका निषेध नहीं है यह जतानेके लिये अगले सूत्रद्वारा उस विषयका माहात्म्य बतलाते हैं ___* तथा उसी पूर्वोक्त स्थितिकी यदि दो समय अधिक आवाधासे न्यून कर्मस्थिति गली है या तीन समय अधिक आबाधासे न्यून कर्मस्थिति गली है। इसी प्रकार आगे जाकर यदि एक वर्ष, वर्षपृथक्त्व, एक सागर या सागर पृथक्त्वसे न्यून शेष कर्मस्थिति गली है तो वे सब कर्मपरमाणु उत्कर्षणसे अझीन स्थितिवाले होते हैं। ___ ४३७. इस सूत्रके सब पद यद्यपि सुगम हैं तथापि उसका भावार्थ यह है कि पूर्व निर्दिष्ट एक समय अधिक उदयावलिके अन्तिम समयमें स्थित स्थितिके कर्मपरमाणुओंकी जिसने बन्ध समयसे लेकर एक समय अधिक जघन्य आबाधा आदि आगेकी सूत्रोक्त सब स्थितिविकल्पोंसे न्यून कर्मस्थितिको गला दिया है उसके वे कर्मपरमाणु उत्कर्षणसे झीन स्थितिवाले नहीं होते अर्थात् उसके वे कर्मपरमाणु उत्कर्षणके योग्य होते हैं, इसलिये इन सभी कर्मपरकाणुओं का यथाशास्त्र उत्कर्षण होता है । और तब अतिस्थापना आबाधाप्रमाण होती है। किन्तु निक्षेप एक समयसे लेकर उत्तरोत्तर एक एक समय बढ़ता हुआ उत्कृष्ट बाधा और एक समय अधिक एक आवलिसे न्यून सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरके प्राप्त होने तक बढ़ता जाता है। इस सूत्रमें 'सागरोवमपुधत्तेण वा' यहां पर आया हुआ 'वा' शब्द अनुक्त विकल्पोंके समुच्चयके लिये है जिससे दस सागरपृथक्त्व, सौ सागर पृथक्त्व, हजार सागर पृथक्त्व, लाख सागर पृथक्त्व, कोड़ी सागर पृथक्त्व, अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर और कोड़ाकोड़ी सागर पृथक्त्व ये सब सम्भव Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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