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________________ १२८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [पदेसविहत्ती ५ सागरोवमखविदकमंसियम्मि तहाविहणियमावलंबणादो च । जइ एवं, णिरयगईए मिच्छत्ताणताणुबंधीणं वेलावहीओ भमादिय परिणामपञ्चएण मिच्छत्तं दूण रईएमप्पाइय तेत्तीससागरोवमाणि थोवृणाणि सम्मत्तमणुपालाविय जहण्णसामित्तं दायव्वमिदि ? ण एवं पि दोसाय, विरोहाभावेण तहाभुवगमादो। ण च वेछावहिसागरोवमाणि परिभमिदस्स तेत्तीससागरोवमपरिब्भमणासंभवेण पञ्चवह यं, वेछावहिबहिब्भदसागरोवमपुधत्तमेत्तसम्मत्त कालपरूवयसंकमसामित्तमुत्तवलेण तदविरोहसिद्धीए ण सो पसंगो। इत्थि-णqसयवेदाणमादेसजहण्णसामियस्स वि तत्थुवएसंतरमस्सियूण पयारंतरेण सामित्तविहाणादो। तं जहा---एत्थ बे उवएसा एक्को ताव सव्वासिं बंधपयडीणमाएण वयाणुसारिणा होदव्वमिदि । अण्णेगो णायाणुसारी वओ, वयाणुसारी वा आओ। किंतु सव्वपयडीणमप्पप्पणो मूलदव्वाणुसारेण समयाविरोहण संकमो होइ त्ति। तत्थ पढमोवएसमस्सिदूण पयट्टमेदं मिच्छत्ताणताणुबंधीणमादेसजहण्णसामित्तप्पाबहुगं च इत्थि-णqसयवेदाणमोघजहण्णसामित्तं पि तदणुसारी चेव । अवस्थाके सिवा अन्यत्र इस प्रकारका नियम स्वीकार किया गया है। दूसरे जो क्षपितकर्माशिक जीव दो छयासठ सागर काल तक परिभ्रमण कर चुका है उसके उस प्रकारके नियमका अवलम्बन लिया गया है। शंका--यदि ऐसा है तो दो छयासठ सागर काल तक परिभ्रमण करा कर और परिणामोंके निमित्तसे मिथ्यात्वमें ले जाकर तथा नारकियोंमें उत्पन्न कराकर कुछ कम तेतीस सागर काल तक सम्यक्त्वका पालन कराकर नरकगतिमें मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्कका जघन्य स्वामित्व देना चाहिए ? समाधान—यही भी दोषाधायक नहीं है, क्योंकि विरोधका अभाव होनेसे उस प्रकारसे उक्त प्रकृतियोंका जघन्य स्वामित्व स्वीकार किया है। यदि कोई कहे कि जो दो छयासठ सागर काल तक परिभ्रमण करता रहा है उसका तेतीस सागर काल तक परिभ्रमण करना असम्भव है सो ऐसा निश्चय करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि दो छयासठ सागरप्रमाण कालके बाहर सागर पृथक्त्वप्रमाण सम्यक्त्वके कालका कथन करनेवाले संक्रमस्वामित्वसूत्र के बलसे उक्त कथन अविरोधी सिद्ध होनेसे उक्त दोषका प्रसङ्ग नहीं आता है । तथा स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके आदेश जघन्य स्वामीका भी वहाँ पर उपदेशान्तरका आश्रय लेकर प्रकारान्तरसे स्वामित्वका विधान किया है । यथा-इस विषयमें दो उपदेश हैं-प्रथम उपदेश तो यह है कि सब बन्ध प्रकृतियों के व्ययके अनुसार आय होना चाहिए । दूसरा उपदेश यह है कि आयके अनुसार व्यय नहीं होता तथा व्ययके अनुसार आय भी नहीं होता किन्तु सब प्रकृतियोंका अपने अपने मूल द्रव्यके अनुसार आगममें प्रतिपादित विधिके अनुसार संक्रम होता है । उनमेंसे प्रथम उपदेशके अनुसार मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धियोंका आदेश जघन्य स्वामित्वविषयक अल्पबहुत्व प्रवृत्त हुआ १. ता०प्रतौ 'वयाणुसारी प्रायो' इति पाठः । २. ता०प्रतौ 'जहरणं वि सामित्तं तदणुसारी' इति पाठः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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