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________________ wwwwwwwww गा० २२] हिदिविहत्तीए उत्तरपयडिहिदिविहत्तियकालो ३६३ ६५३. आणदादि जाव उवरिमगेवज्जो त्ति सव्वपयडी० उक्क० ज० एगस०, उक्क० संखेज्जा समया । अणुक्क० सव्वद्धा । एवमणुदिसादि जाव सव्वदृसिद्धि त्ति । एवं खइयसम्मादिहीणं । आहार० सव्वपय० उक्क० ज० एगसमओ, उक्क० संखेज्जा समया । अणुक्क० ज० एगसमओ, उक्क० अंतोमु० । एवमवगद०-अकसा-मुहुमसांपराय०-जहाक्खादसंजदे त्ति । एवमाहारमिस्स० । णवरि अणुक० ज० अंतोमु० । कम्मइय. एइंदियभंगो । णवरि सम्मत्त०सम्मामि० अणुक्क. सत्तणोक० उक्क० ज० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे०भागो । एवमणाहारीणं । आभिणि-सुद० ओहि० सव्वपयडी० उक्क० ज० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे०भागो । अणुक्क० सव्वदा । एवं संजदासंजद-अोहिदंस-सुक्क०-सम्मादिहि-वेदय दिहि त्ति । मणपज्ज. सव्वपयडी० सव्वहभंगो। एवं संजद०-सामाइय-छेदो०-परिहारकिन्तु इसका कुछ अपवाद है। बात यह है कि इन तीनों मार्गणाओंमें एक जीवकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है, अतः यहां इनके उत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट काल ओघके समान न प्राप्त हाकर आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही प्राप्ता होगा। और इन मार्गणाओं में सम्यक्त्व तथा सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना नहीं होती है अतः यहां इन दोनों प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय न प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्त प्रात होगा। किन्तु सासादन गुणस्थानका जघन्य काल एक समय है, अतः इसमें सब प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय ही प्राप्त होगा। ६६५३. आनत कल्पसे लेकर उपरिमौवेयक तकके देवोंमें सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति विभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। तथा अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका काल सर्वदा है। इसी प्रकार अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंके जानना चाहिये। तथा इसी प्रकार क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंके जानना चाहिये । श्राहारककाययोगियों में सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है । तथा अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार अपगतवेदवाले, अकषायी, सूक्ष्मसांपरायिक संयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके जानना चाहिये। तथा इसी प्रकार आहारकमिश्रकाययोगियोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें सब प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है । कार्मणकाययोगियों में एकेन्द्रियोंके समान भंग है । किन्तु इतनी विशेषता है कि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अनुत्कृष्ट स्थिातविभक्तिवाले जीवोंका और सात नोकषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इसी प्रकार अनाहारक जीवोंके जानना चाहिए। आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति विभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण है। तथा अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका काल सर्वदा है। इसी प्रकार संयतासंयत, अवधिदर्शनवाले, शुक्ललेश्यावाले, सम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोंके जानना चाहिये । मनःपर्ययज्ञानियोंमें सब प्रकृतियोंकी अपेक्षा सर्वार्थसिद्धिके समान भंग है। इसी प्रकार संयत, सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत और परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंके जानना चाहिये । असंज्ञियोंमें एकेन्द्रियोंके समान पू० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001409
Book TitleKasaypahudam Part 03
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Digambar Sangh
Publication Year
Total Pages564
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size15 MB
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