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________________ उत्तरपगदिपदेसबंधे सण्णियासं २०९ ओरालि अंगो०-मणुसाणु०-थिराथिर-सुभासुभ-अजस'. सिया० संखेंअदिभागूणं० । असादा०-अपञ्चक्खाण०४-चदुणोक० सिया० यदि बं० णि० उक्क० । पञ्चक्खाणा०४ सिया० तं. तु० अणंतभागूणं० । कोधसंज० णि. बं० दुभागूणं० । माणसंज. सादिरेयदिवड्डभागूणं० । मायासंज-लोभसंज०-पुरिस०-[जस०] णि. बं० संखेंजगुणहीणं० । देवगदि-वेउवि०-वेउव्वि अंगो०-वजरि०देवाणु०-तित्थ० सिया० तं० तु० संखेजदिभागूणं बं० । आहारदुगं सिया० तंतु० संखेजदिभागूणं बं० । समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सर-आदें णि. बं० णि तंतु० संखेंजदिभागूणं बं० । एवं पयला० । ३२४. असाद. उक्क० पदे०बं० पंचणा०-चदुदंस० पंचंत० णि० बं० णि. अणु० संखेंजदिभागूणं बं०। थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थि०-णस०. णिरय-णिरयाणु०-आदाव०-णीचा० सिया० उक्क० । णिद्दा-पयला-भय-दु० णि बं० आङ्गोपाङ्ग, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, और अयशःकोर्तिका कदाचित् बन्ध करता है। यदि वन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। असातावेदनीय, अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और चार नोकषायका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्कका कदाचित् बन्ध करना है। किन्तु वह इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध करता है तो नियमसे अनन्त भागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। क्रोधसंज्वलनका नियमसे बन्ध करता है जो नियमसे दो भागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। मानसंज्वलनका नियमसे बन्ध करता है जो नियमसे साधिक डेढ़ भागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। मायासंज्वलन, लोभसंज्वलन, पुरुषवेद और यश-कीर्तिका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे संख्यातगुणहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। देवगति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, वज्रर्षभनाराचसंहनन, देवगत्यानुपूर्वी और तीर्थङ्करप्रकृतिका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यानभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। आहारकद्विकका कदाचित् करता है। यदि बन्ध करता है तो उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयका नियमसे बन्ध करता है। किन्तु वह इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी कर हे और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। इसीप्रकार प्रचला प्रकृतिकी मुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिए। . ३२४. असातावेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला जीव पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तरायका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचार, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, आतप और नीचगोत्रका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। निद्रा, प्रचला, भय, और १. प्रा.प्रतौ 'सुभासुभ जस० अजस०' इति पाठः । २. पा प्रतौ 'पयला । 'उक्क०' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001393
Book TitleMahabandho Part 6
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages394
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size10 MB
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