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________________ कल्याण मन्दिर स्तोत्र ३३ प्रभु के तो सान्निध्य-मात्र से ही राग-भाव दूर हो जाता है । जो भी साधक प्रभु के चरणों में आया, संसार का राग-भाव त्याग कर वीतराग बन गया । वीतराग के पास आकर भला कौन वीतराग नहीं हो जाता ? आचार्यश्री का गम्भीर अभिप्राय यह है कि भगवान् के पास रहकर अशोकवृक्ष वीतराग कैसे हो गया ? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है ? वह अशोकवृक्ष तो अचेतन था, यदि वह राग छोड़कर वीतराग बन गया तो क्या हुआ, भगवान् के पास आ कर तो बड़े-बड़े सचेतन तार्किक भी अपना मत- पन्थ आदि का एवं सांसारिक वासनाओं का राग त्यागकर, वीतराग भाव की उपासना करने लगते हैं, वैराग्य भाव धारण कर लेते हैं । सचेतन को समझाना कठिन है । अचेतन को तो हर कोई बदल सकता है । सचेतन को केवल ज्ञानी ही बदल सकते हैं । यह 'भा-मण्डल' नामक छठे प्रातिहार्य का वर्णन है । [ २५ ] प्रमादमवधूय भजध्वमेनमागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम् । देव ! जगत्त्रयाय, मन्ये नदन्नभिनभः सुर- दुन्दुभिस्ते || भो भोः एतन्निवेदयति C हे देव ! आकाश में सब ओर गर्जन करती हुई देवदुन्दुभि तीन जगत् को इस प्रकार सूचना देती है कि'ये भगवान् पार्श्वनाथ मोक्षपुरी को जानेवाले Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001381
Book TitleKalyan Mandir
Original Sutra AuthorSiddhasen Divakarsuri
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1980
Total Pages101
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, Stotra, P000, & P010
File Size3 MB
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