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________________ -८.६८४] अट्ठमा महाधियारो [८१७ जिणमहिमदंसणेणं केई जादीसुमरणादो वि । देवद्धिदसणेण य ते देवा देसणेवसेणं ॥ १७७ गेण्हंते सम्मत्तं णिव्वाणभुदयसाहणणिमित्तं । दुब्वारगहिरसंसारजलहिणोत्तारणोवायं ।। ६७८ णवरि हु णवगेवजा एदे देवविजिदा होति । उवरिमचोद्दसठाणे सम्माइट्ठी सुरा सम्वे ॥ ६७९ । दसणगहणकारण समतं । आईसाणं देवा जणणा एइंदिएसु भजिदव्या । उवरि सहस्सारतं ते भज्जा' सण्णितिरियमणुवत्ते ॥ ६८० तत्तो उवरिमदेवा सब्वे सुक्काभिधाणलेस्साए । उप्पजति मणुस्से णत्थि तिरिक्खेसु उववादो ॥ ६॥ देवगदीदो चत्ता कम्मक्खेत्तम्मि सणिपजत्ते । गम्भभवे जायते ण भोगभूमीण णरतिरिए ॥ १८२ सोहम्मादी देवा भजा हु सलागपुरिसणिवहेसु । णिस्सेयसगमणेसु सम्वे वि अणंतरे जम्मे ॥ ६८५ णवरि विसेसो सम्वट्टसिद्धिठाणदो विच्चुदा' देवा । वजा सलागपुरिसा णिवाणं जति णियमेणं ॥ १८४ । एवं आगमणपरूवणा सम्मत्ता । ___ उनमेंसे कोई देव जिनमहिमाके दर्शनसे, कोई जातिस्मरणसे, कोई देवर्द्धिके देखनेसे, और कोई उपदेशके वशसे, निर्वाण एवं स्वर्गादि अभ्युदयके साधक तथा दुर्वार एवं गंभीर संसाररूपी समुद्रसे पार उतारनेवाले सम्यक्त्वको ग्रहण करते हैं ॥ ६७७-६७८ ॥ विशेष यह है कि नौ ग्रैवेयकोंमें उपर्युक्त कारण देवद्धिदर्शनसे रहित होते हैं । इसके ऊपर चौदह स्थानोंमें सब देव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं ॥ ६७९ ॥ दर्शनग्रहणके कारणोंका कथन समाप्त हुआ । ईशान कल्प तकके देवोंका जन्म एकेन्द्रियोंमें विकल्पनीय है। इससे ऊपर सहस्रार कल्प तकके सब देव विकल्पसे संज्ञी तियं च या मनुष्य होते हैं ॥ ६८० ॥ इससे ऊपरके सब देव शुक्ल लेश्याके साथ मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं, इनकी उत्पत्ति तिर्यंचोंमें नहीं है ॥ ६८१ ॥ देवगतिसे च्युत होकर वे देव कर्मभूमिमें संज्ञी पर्याप्त व गर्भज होते हैं, भोगभूमियों के मनुष्य और तिर्यंचोंमें उत्पन्न नहीं होते ॥ ६८२ ॥ सब सौधर्मादिक देव अगले जन्ममें शलाकापुरुषोंके समूहमें और मुक्तिगमनके विषयमें विकल्पनीय हैं ॥ ६८३ ॥ विशेष यह है कि सर्वार्थसिद्धिसे ध्युत हुए देव शलाकापुरुष न होकर नियमसे निर्वाण प्राप्त करते हैं ॥ ६८४॥ इस प्रकार आगमनप्ररूपणा समाप्त हुई । १६ देवत्ति, व देवग्छि. २ द व दंसण. ३ व व रहिष. ४ द व भन्नाः ५ द व विजुदो. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001275
Book TitleTiloy Pannati Part 2
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1956
Total Pages642
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size12 MB
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