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________________ ९२८ नागवर (भी) अन्तिम सोलह द्वीपमें ग्यारहवां द्वीप५।६२४ नागवेलन्धर(व्य)वेलन्धरजाति के नागकुमार देव ५।४६५ नागश्री (व्य) एक स्त्री ६४।६ नाट्यमाल (व्य) एक देव नाडी (पा) दो किष्कु-चार हाथकी एक नाडी ७।४६ नान्दी (व्य) छठा बलभद्र ६०।२९० नान्दीवर्धना व्यरुचिकगिरिके अंजनमूलक कूटपर रहने वाली देवी ५१७०६ नाभिगिरि (भौ) हैमवत, हरि रम्यक और हैरण्यवत क्षेत्रके मध्यमें स्थित श्रद्धावत आदि पर्वत ५।१६३ नाभिराज व्य) चौदहवां कुल कर ७११६९ नाभेय (व्य) भगवान् वृषभदेव ९।२५ नाम (सुबन्त)= पदगत गान्धर्व की विधि १९।१४९ नामकर्म (पा) शरीरादि रचना. का हेतु कर्म ५८।२१७ नामसत्य (पा) दश प्रकारके सत्यों में से एक सत्य१०.९८ नामादिक (पा) नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव ये चार निक्षेप २।१०८ नामान्त (भौ) वि. द. नगरी २२।९६ नारद (व्य) एक देव ६०८० नारक (भी) रत्नप्रभा पृथिवीके द्वितीय प्रस्तारका इन्द्रक बिल ४७६ नारद (व्य) क्षीरकदम्बका एक शिष्य १७०३८ हरिवंशपुराणे नारद (व्य) पदवीधर नारद । ५४।४ नारद (व्य) वसुदेव और सोम श्रीका पुत्र ४८।५७ नारसिंह (व्य)वसुदेवका सम्बन्धी एक विद्याधर ५१।३ नारायण (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१९ नारायण (व्य) आठवाँ नारायण ६०।२८९ नारी (भौ) एक महानदी ५।१२४ नारीकूट (भौ) रुक्मिकुलाचलका चौथा कूट ५।१०३ नासारिक (भौ) देशका नाम १११७२ निकृतिभाषा (पा) सत्यप्रवाद पूर्वकी १२ भाषाओंमें एक भाषा १०।९५ निक्षेप (पा) अजीवाधिकरण आस्रवका भेद ५८०८६ निक्षेपादानसमिति (पा) योग्य वस्तुको देखकर रखना उठाना २।१२५ निगोद (पा) नरकों के विल ४।३५३ नित्यालोक (भो) धातकीखण्ड वि द. का एक नरक ३३॥१३१ नित्यालोक (भौ) रुचिकगिरि या दक्षिण-दिशासम्बन्धी एक विशिष्ट कूट ५।७१९ निदान (पा) सल्लेखना व्रतका अतिचार ५८।१८४ निदाघ (भी) बालुकाप्रभा पृथिवीके पंचम प्रस्तारका इन्द्र क विल ४.१२२ नित्योद्योत (भौ) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी एक विशिष्ट कूट ५।७२० निधत्तानिधत्तक (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभृतका योग. द्वार १०८५ निपुणमति (व्य) रानी राम दत्ताकी धाय २७२१ निबन्धन (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभतका योगद्वार १०१८२ निमग्नजला (भौ) विजयार्धको गुहाके भीतर मिलनेवाली एक नदी १११२६ नियुत(पा)चौरासी लाख नियु तांगोंका एक नियुत ७।२६ नियुताङ्ग (पा) चौरासी लाख पूर्वांगोंका एक नियुतांग ७।२६ निरुद्ध (भौ) पाँचवीं पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी तम इन्द्रककी पूर्व दिशामें स्थित महानरक ४१५६ निरोध (भौ) चौथी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी आर इन्द्रकको दिशामें स्थित महानरक ४१५५ निघृण (वि) निर्दय १११९१ निघृणता = निर्दयता ५५।८९ निम्रन्थ (पा) मुनिका एक भेद ६४।५८ निर्वक्ष शाइवला = एक विद्या २२।६३ निर्नामक (व्य) रानी नन्दयशा का पुत्र ३३११४६ निवर्तना (पा) अजीवाधिकरण आस्रवका भेद ५८1८६ निर्विचिकित्सा = बिना किसी ग्लानिके १८।१६५ निर्वाण = मोक्ष १।१२५ निर्वाण (पा) आग्रायणी पूर्वको वस्तु १०८० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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