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________________ शब्दानुक्रमणिका ९२९ नीलयशा (व्य) चारुदत्तकी स्त्री १९८२ नीलाञ्जना(व्य) नोलवान् विद्या धरकी पुत्री २३।४ नीललेश्या = लेश्याका एक भेद ४।३४३ नीलाञ्जना (व्य) सिंहदंष्ट्र की स्त्री २२।११३ नीलाजसा (व्य)इन्द्रको नर्तकी ९।४७ नीलवान् (व्य) शकटामुख नगर का स्वामी विद्याधर २३।३ नीलवान् (भौ) नील कुलाचलसे साढ़े पांच सौ योजन दूर नदीके मध्यमें स्थित एक ह्रद ५।१९४ निर्विषण = विरक्त १११२१ निवृति (व्य)प्रतिमाओंके समीप विद्यमान एक देवी ५।३६३ निर्वृति - एक विद्या २२।६५ निवृत्ति (पा)इन्द्रियाकार पुद्गल का परिणमन १८८५ निशान्त = घर ३५।१ निशान्त = प्रातःकाल ३५।११ निशुम्भ (व्य) चौथा प्रति नारायण ६०।२९१ निश्चयकाल (पा) लोकाकाशके प्रत्येक प्रदेशपर स्थित अमूर्तिक कालाणु ७।३ निष्कषाय(व्य)आगामी तीथंकर ६०।५६० निषद्यका (पा)=अंग बाह्यश्रुत का एक भेद २।१०५ निषध (व्य) निषध देशका राजा ५०।१२४ निषध (भौ) जम्बूद्वीपका तीसरा कुलाचल ५।१५ निषध (भौ) निषध पर्वतसे उत्तरकी ओर नदीके मध्य स्थित एक ह्रद ५।१९६ निषध (भौ) नन्दनवनका एक कूट ५।३२९ निषध (व्य एक राजा ५०1८३ निषध (व्य) बलदेवका पुत्र ४८।६६ निषध कूट (भो) निषधाचल का दूसरा कूट ५।८८ निषाद = एक स्वर १९।१५३ निषाद = भील ३५।६ निषादजा-षड्ज स्वरसे सम्बन्ध रखनेवाली जाति१९।१७४ निष्कम्प (व्य) विजयका पुत्र ४८।४८ निष्क्रमण = दीक्षाकल्याणक २१५५ ११७ Jain Education International निष्काम = तालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९।१५० निष्क्रान्त - दीक्षित हो गय। १८।१७८ निसर्गक्रिया (पा) एक क्रिया ५८७५ निसर्ग ( पा) अजीवाधिकरण आस्रवका भेद ५८१८६ निसृष्ट (भौ) चौथी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी आर इन्द्रककी पूर्व दिशामें स्थित महानरक ४।१५५ निहतशत्रु (व्य) शतधनुके वंश का एक राजा १८०२१ निह्नव (पा)ज्ञाना. और दर्शना. का आस्रव ५८।९२ नील (भौ) छठी पृथिवीके प्रथम प्रस्तारसम्बन्धी हिम इन्द्रककी पूर्व दिशामें स्थित महानरक ४।१५७ नील (व्य)नीलवान् विद्याधरका पुत्र २३१४ नील (भौ) जम्बूद्वीपका छठा कुलाचल ५।१५ नीलक (व्य) रुचकगिरिके श्रीवृक्ष कूटका निवासी देव ५७०२ नीलकण्ठ (व्य) नीलका पुत्र २३७ नीलकण्ठ (व्य) आगामी प्रति नारायण ६०१५७० नीलकण्ठ (व्य) एक विद्याधर राजा २५।६३ नीलकूट (भौ) नीट कुलाचलका दूसरा कूट ५।९९ नीलगुहा(भौ) राजगृहके समीप वर्ती एक गुफा ६०।३७ नीलयशा (व्य) सिंहदंष्ट्र और नीलांजनाको पुत्री २२१११३ [प] पङ्क (भौ) छठी पृथिवीके हिम नामक इन्द्रकी दक्षिण दिशामें स्थित महानरक ४।१५७ पङ्कप्रमा (भौ) चौथी पृथिवी ४।४४ पङ्कबहुल (भौ) रत्नप्रभा पृथिवीका दूसरा भाग ४।४८ पक्ष (पा) व्यवहार कालका भेद १५ दिनका पक्ष होता है ७.२१ पण्डक = नपुंसक ३।११३ पञ्चकल्याणविधि (पा) एक व्रतका नाम ३४।१११ पञ्चम (पा) एक स्वरका नाम १९।१५३ पञ्चमहाव्रत (पा) परिग्रहत्याग महाव्रत २।१२१ पञ्चमी (पा) मध्यम ग्रामके For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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