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________________ ९०० हरिवंशपुराणे अरिष्टा (भौ) धूमप्रभाका रूढ़ि नाम ४।४६ अरिष्टनेमि (व्य) बाईसवें तीर्थ कर १।२४ अरिष्टनेमि (व्य) समुद्रविजयके पूर्व बाईसवें तीर्थंकर ४८।४३ अरिषड्वर्ग=काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य यह अन्तरंग छह शत्रु है १७।१ अरुण, अरुणप्रभ (व्य) अरुण द्वीपके रक्षक देव ५।६४५ अरुण (भो) सौधर्म युगलका छठा इन्द्रक ६।४४ अरुण (व्य) हरिक्षेत्रके नाभि गिरिपर रहनेवाला व्यन्तर देव ५।१६४ भरुणद्वीप (भो) नौवाँ द्वीप ५।६१७ अरुणसागर (भो) नौवां सागर ५।६१७ अरुण (व्य) लौकान्तिक देवका एक भेद ५५।१०१ अरुणोद्भासद्वीप (भौ) दसवां द्वीप ५।६१७ अरुणोद्रास सागर (भी) नौवाँ सागर ५१६१७ अर्क (व्य) लौकान्तिक देवका एक भेद . दूसरा नाम आदित्य ५५।१०१ अर्क (व्य) राजा वसुका पुत्र १७१५८ अर्कप्रम (व्य) कापिष्ठ स्वर्गका एक देव ( रश्मिवेगका जीव) २७।८७ अर्कमूल (भौ) वि. द. नगरी २२९९ अर्चाख्य (पा) स्फटिक सालका उत्तर गोपुर ५७१६० अर्चि (भौ) पहला अनुदिश अलम्जल = गोली ५।४४५ अलम्बुष (व्य) विजयका पुत्र अचिर्माली (व्य) किन्नरोद्गीत ४८०४८ ___ नगरका राजा १९८१ आलोक = प्रकाश २।१० अर्चिमालिनी (भो) दूसरा अनु अलंकार = वैणस्वरका एक भेद दिश ६६३ १९।१४७ अर्चिष्मान् (व्य) जरासन्धका अवक्रान्त (भी) रत्नप्रभा पुत्र ५२।४० पृथिवीके बारहवें प्रस्तारका भर्जुन (व्य) पाण्डव ४५।२ इन्द्रक विल ४७७ अर्थपद (पा) अर्थबोधक पद- अवग्रह (पा) मतिज्ञानका भेद समूहको अर्थपद कहते है १०।१४६ १०।२३ अवतंस = कानका आभूषण अर्थ (पा) आग्रायणी पूर्वकी ४३१२४ वस्तु १०७९ अवदात = उज्ज्वल २।३२ अर्हत् = अरहन्त १।१३ अवधिज्ञामचक्षष - अवधिज्ञानके अर्हदत्त (व्य)धनदत्त और नन्द धारक ३।४७ __ यशाका पुत्र १८।११५ अवध्या (भौ) विदेहकी एक अर्हद्भक्ति = भावना ३४।१४१ ___ नगरी ५।२६३ अर्हदास (व्य) गन्धिला देशकी अवनद्ध = चमड़े मढ़े हुए मृदंग अयोधा नगरीका राजा आदि वादित्र १९।१४२ २७।११२ अवयव = तालगत गान्धर्वका अहंदास (व्य) धनदत्त और प्रकार १९।१५१ नन्दयशाका पुत्र १८।११४ अवाय (पा) मतिज्ञानका भेद अर्हदास (व्य) ज. वि. सुपमा १०११४६ . देशके सिंहपुर नगरका ____ अवर्णवाक् (पा) मिथ्यादोष । राजा ३४/३ कथन ५८९६ अलका (व्य) मद्रलिसा नगरीके अवसर्पिणी (पा) जिसमें बुद्धि, सेठकी स्त्री ३३।१६७ बल, विद्या आदि सद्गुणोंअलका (व्य) मेघदलपुरके सेठ का ह्रास हो ऐसा कालभेद ___ मेघकी स्त्री ४६।१५ १२२६ अलका (भौ) विद्याधरोंकी - अवसर्पिणी (पा) दश कोड़ानगरी ६०११८ कोड़ी अद्धा सागरोंकी एक अलंकारविधि = शरीर स्वरका अवसर्पिणी ७५६-५७ भेद १९।१४८ अवसंज्ञ (पा) अनन्तानन्त परअलोक (पा) लोकके बाहरका ___ माणुओंका समूह ७३७ अनन्त आकाश २।११० अवन्तिसुन्दरी (व्य) वसुदेवकी अलोकाकाश (पा) चौदह राजु एक स्त्री ३१७ प्रमाण लोकके बाहरका अविदार्य = तालगत गान्धर्वका अनन्त आकाश ४१ एक प्रकार १९।१५१ For Private & Personal Use Only - www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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