SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 939
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ शब्दानुक्रमणिका ९०१ अविपाकजा (पा) निर्जराका भेद ५८।२९५ अविध्वंस (व्य) विभुका पुत्र १३।११ अशनिघोष (व्य) मानुषोत्तरके अंजनकूटपर रहनेवाला देव ५।६०४ अशनिवेग (व्य) विजया पर्वतके कुंजरावर्त नगरका राजा १९७० अशनिवेग (व्य)अचिर्माली और प्रभावतीका पुत्र १९४८१ अशनिवेग (व्य) वसुदेवका सम्बन्धी एक विद्याधर ५११२ अशय्याराधिनी = एक विद्या २२१७० अशित (व्य)एक राजा५०।१३० भशुमभुति (पा) अनर्थदण्डका भेद ५८।१४६ अशोक (व्य) एक राजा६०।६९ भशोक (भो) वि. उ. नगरी २२।८९ अशोकपुर (भौ) अशोक नामक देवका निवास स्थान५।४२६ अशोकवन (भी) विजयदेवके नगरसे २५ योजन दूर पूर्वमें स्थित एक वन ५।४२२ अशोका (भौ) नन्दीश्वर द्वीपके पश्चिम दिशा सम्बन्धी अंजनगिरिकी पूर्व दिशामें स्थित वापिका ५।६६२ अशोका (व्य) राजा प्रचण्ड वाहनकी पुत्री ४५।९८ अशोका (भी) विदेहको एक नगरी ५।२६२ अश्मक(भो) देशका नाम ११७० अश्मगर्भ = नीलमणि ५।१७८ अश्मगर्भकूट (भी) मानुषोत्तर Jain Education International पर्वतकी पूर्व दिशाका एक कूट ५।६०२ अश्वकण्ठ (व्य) आगामी प्रति नारायण ६०१५७० अश्वक्रान्ता. = षड्जस्वरकी मूर्च्छना १९।१६२ अश्वग्रीव (व्य) अागामी प्रति नारायण ६०५७० अश्वग्रोव (व्य) त्रिपिष्टिक नारायणका प्रतिनारायण २८/३१ अश्वग्रीव (व्य) एक शास्त्र ५२।५५ अश्वग्रीव (व्य)पहला प्रतिनारा यण ६०१२९१ अश्वत्थामा (व्य) द्रोणाचार्यका पुत्र ४५।४८ __ अश्वपुरी (भौ) विदेहकी एक नगरी ५।२६१ अश्वयुज = आश्विन माह ५६।११२ अश्विनी (व्य)द्रोणाचार्यकी स्त्री ४५१४८ अश्वसेन (व्य) वसुदेव और ____ अश्वसेनाका पुत्र ४८५९ अष्टअष्टम-व्रतविशेष ३४।९३-९४ अष्टम = तीन उपवास ३४।१२५ अष्टगुणात्मक (वि) ज्ञान, दर्शन, अब्याबाधत्व, सम्यक्त्व, अवगाहनत्व,सूक्ष्मत्व,अगुरुलघुत्व,वीर्य इन आठ गुण रूप मोक्ष २।१०९ अष्टापद = कैलास पर्वत १९।८७ अष्टप्रातिहाय - अशोक वृक्ष, सिंहासन, छत्रत्रय आदि आठ प्रातिहार्य २०६७ अष्टप्रातिहार्य (पा) समवसरण में प्राप्त होनेवाले, जिनेन्द्र के आठ विशेष भूषण-१ अशोक, २ सिंहासन, ३ छत्रत्रय, ४ भामण्डल, ५ दिव्यध्वनि, ६ पुष्पवृष्टि, ७ चतुःषष्टि चामर, ८ दुन्दुभि बाजा अष्टमभक्त = तीन दिनका उप वास १९८ असंग (व्य) वज्रधर्मका पुत्र ४८।४२ असंभ्रान्त (भी) रत्नप्रभा पृथिवीके सातवें प्रस्तारका इन्द्रक विल ४७६ असमीक्ष्याधिकरण (पा) अनर्थ दण्डका अतिचार५८।१७९ असंयतसम्यग्दृष्टि (पा) चतुर्थ गुणस्थान ३३८० । असांप्रत = अनुचित- अयुक्त ५४।६२ असितपर्वत (भी) वि.उ. नगरी २२।९६ असुधारिन् =प्राणी २०२० असुर-भवनवासी देवोंका एक भेद ४।६३ असुरोद्गीत (भौ) विद्याधरोंका एक नगर ४६।८ अस्वष्ट (भौ) देशविशेष ३।३ अस्तिकाय (पा) बहुप्रदेशी द्रव्य (कालको छोड़कर जीवादि पाँच द्रव्य) ४.५ अस्ति-नास्तिप्रवाद(पा)पूर्वगत श्रुतका एक भेद ३।९८ भस्नान(पा) मुनियोंका एक मूल गुण जीव-रक्षाके लिए स्नान न करना २।१२८ अहमिन्द्र (पा) अवेयक आदिके वासी देव ३।१५१ अहिंसामहाव्रत (पा)षट्कायिक 'जीवोंकी हिंसासे निवृत्ति २।११८ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy