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________________ ८९८ हरिवंशपुराणे अन्तर्विचारिणी = एक विद्या २२।६८ अन्ववाय = कुल ४५।४ अपघन = शरीर १६।१९ अपथाशिन् (वि) 'कुमार्गको नष्ट . करनेवाले १११२ अपदर्शन कूट (भौ) नीलकुला चलका नौवाँ कूट ५।१०२ अपभ्यान (पा) अनर्थदण्डका भेद ५८।१४६ अपराजित(व्य) राजा जरासन्ध का भाई १८१२५ अपराजित(पा) स्फटिक सालका उत्तर गोपुर ५७।६० अपराजित (भौ) जम्बूद्वीपका जगतीका उत्तर द्वार ५।३९० अपराजित (व्य) एक श्रुतकेवली आचार्य ११६१ अपराजित (भौ) अनुत्तर विमान रत्नोच्चय कूटपर रहने- अब्ज-शंख ३५१७२ वाली देवी ५७२६ अभय (व्य) राजा श्रेणिकका अपराजिता (पा) समवसरणके पुत्र २।१३९ सप्तपर्ण वनकी वापिका अमयनन्दी (व्य) एक मुनि ५७।३३ ३३११०० अपराजिता (भौ) नन्दीश्वर __ अभ्याख्यानभाषा (पा) सत्य द्वीपके दक्षिण दिशासम्बन्धी प्रवाद पूर्वकी १२ भाषाओंअंजनगिरिकी उत्तर दिशा- में-से एक भाषा १०१९२ सम्बन्धी वापिका ५।६६० अभिख्या = शोभा २।२४ अपराजिता (भौ) विदेहकी एक अमिचन्द्र (व्य) राजा भद्रका नगरी ५।२६३ पुत्र १७।३५ अपरान्त (पा) आग्रायणीपूर्वकी अमिचन्द्र (व्य) दसवाँ कुलकर एक वस्तु १०७८ ७.१६१ अपरविदेहकूट (भौ) नीलकुला- अभिजया (पा) समवसरण के चलका सातवाँ कूट ५।१०० सप्तपर्णवनको वापिका अपरिग्रह महाव्रत (पा) बाह्या ५७।३३ भ्यन्तर परिग्रहका त्याग अमितवेग (व्य) गगनचन्द्र और २।१२१ गगनसुन्दरीका पुत्र ३४१३५ अपवर्ग= मोक्ष १०११० अभिनन्दन (व्य) चतुर्थ तीर्थअपात्र (पा) जो स्थूल हिंसादिके कर १३।३१ अनिवृत्त हैं ७।११४ अमिनन्दन (व्य) चतुर्थ तीर्थअपाय विचय (पा) धर्म्यध्यान कर ११६ __का एक भेद ५६।३९-४० अभिनन्दिनी (पा) समवसरणअपूर्वकरण (पा) परिणामविशेष के अशोकवनकी वापिका ३३१४२ ५७।३२ अपूर्वकरण (पा) आठवाँ गुण- अभिसन्धि = अभिप्राय १७।११२ स्थान ३।८२ अमिषव= अभिषेक २१५० अतणति भाषा (पा) सत्यप्रवाद अभिषवाहार (पा) भोगोपभोगपूर्वको १२ भाषाओं में से व्रतका अतिचार ५८।१८२ एक भाषा १०९५ अमीणज्ञानोपयोग = भावना अप्रतिष्ठान (भी) महातमःप्रभा ३४।१३५ पृथिवीका. इन्द्रक विल अभ्यर्ण = अनिकट ४३३१ ४।१५० अभिचन्द्र (व्य) अन्धकवृष्णि अप्रतिष (पा) स्फटिक सालका और सुभद्राका पुत्र १८।१४ दक्षिण गोपुर ५७।५८ अभिराम - सुन्दर ३२।१० अप्रत्याख्यान क्रिया (पा) एक अमिरुद्गता = षड्ज ग्रामकी क्रिया ५८०२२ मूर्च्छना १९।१६२ अप्रमत्तसंयत (पा) सातवाँ ___ अमर (व्य) राजा सूर्यका पुत्र गुणस्थान ३।८१ १७.३३ अपराजित (व्य) जरासन्धका भाई ५।१४ अपराजित (भौ) वि. उ. नगरी . २२१८७ अपराजित (व्य) सिंहपुरके राजा अर्हद्दास-जिनदत्ताका पुत्र । भगवान् नेमिनाथका जीव ३४.५ अपराजित (व्य) भगवान् वृषभ देवका गणधर १२।६१. अपराजित (व्य) चक्रपुरका राजा २७१८९ अपराजित (व्य) एक राजा ६०।१०५ अपराजिता (व्य) रुचिकगिरिके अरिष्टकूटपर रहनेवाली देवी ५।५०७ अपराजिता (व्य) रुचिकगिरिके Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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