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________________ ८९७ शब्दानुक्रमणिका अनिकाचित (पा) आग्रायणी अनीक=सेना-यह सेना,पदाति, पूर्वके चतुर्थ प्राभृतका अश्व, वृषभ, रथ, हाथी, योगद्वार १०८५ गन्धर्व और नर्तकीके भेदसे अनिच्छ (भौ) दूसरी पृथिवीके सात प्रकारको होती है प्रथम प्रस्तार सम्बन्धी ३८२२ तरक इन्द्रककी पूर्व दिशामें ___अनीकदत्त (व्य) देवकीका पुत्र स्थित महानरक ४।१५३ ३३।१७० अनिन्दिता (व्य) नन्दनवनमें अनीक पालक (व्य) देवकीका रहनेवाली दिक्कुमारी देवी पुत्र ३३।१७० ५।३३३ अनुत्तर (भौ) अनुदिशोंके ऊपर अनघ (पा) स्फटिक सालका स्थित पाँच विमान ६१४० दक्षिण गोपुर ५७।५८ अनुत्तर (भो) नौ अनुदिशोंके अनगार (व्य) शीतलनाथका ऊपर एक पटलमें स्थित प्रथम गणधर ६०।३४७ विजय आदि पाँच विमान अनगार = सामान्यमुनि ३।६२ ३।१५० अनन्तवीर्य (व्य) जयकुमारका अनुत्तर (वि) श्रेष्ठनय २११३८ पुत्र १२१४८ अनुत्तरोपपादिकदशाङ्ग (पा) = अनन्तवीर्य (व्य) चारणमुनि द्वादशांगका एक भेद २१९४ ६०।२१ अनुत्सेक = गर्व नहीं करना अनन्तवीर्य (व्य)आगामी तीर्थ- ५८।११४ - कर ६०१५६३ अनुन्धरी (व्य) विश्वसेनकी स्त्री अनन्तमित्र (व्य)उग्रसेनके चाचा ६०।५८ __ शान्तनुका पुत्र ४८६४० अनुदात्त = वेदमें प्रत्युक्त होनेअनन्तमति (व्य) एक मुनि वाला स्वरविशेष (नीचरनु* २७।११७ दात्तः) १७८७ अतिबल (व्य) धरणीतिलक अनुदिश (भौ) ग्रैवेयकोंके ऊपर नगरका राजा २७१७८ स्थित नौ विमान ६।४० अतिबल (व्य) साकेत नगरका अनुदिशस्तूप (पा)समवसरणका राजा २७१६३ स्तूप ५७।१०१ अतिबल (व्य) महाबलका पुत्र अनुदिश (भौ) अवेयकोंके ऊपर १३८ स्थित एक पटलके नौ अतिबल (व्य)आगामी नारायण विमान ३११५० ६०१५६६ अनुपम (व्य) ऋषभदेवका गणअतिबल (व्य) ऋषभदेवका धर १२१६९ __ गणधर १२।६८ अनुप्रेक्षा (पा) अनु + प्रा + अतिभारारोपण (पा) अहिंसाणु ईक्षा पदार्थके स्वरूपका व्रतका अतिचार ५८।१६४ बार-बार चिन्तन करना। अनिवर्तक (व्य) आगामी तीर्थ- इसके अनित्य, अशरण आदि कर ६०१५६१ १२ भेद हैं २११३० ११३ Jain Education International For Private & Personal Use Only अनुभवबन्ध (पा) बन्धका एक भेद ५८।२०३ अनुमतिका (व्य) द्रौपदीका भवान्तर ४६५७ अनुमति (व्य), कापिष्ठलायनकी स्त्री १८।१०३ अनुयोग (पा) श्रुतज्ञानका भेद १०११३ अनुयोग (पा) प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग २११४७ अनुयोग (पा) दृष्टिवाद अंगका एक भेद १०६१ अनुवादी = स्वर प्रयोगका एक प्रकार १९।१५४ अनुवीर्य (व्य) ५०।१२६ अनेकप:अनेककी रक्षा करने वाला ३७४२७ भनेकप- हाथी ३७।२७ अनेकाग्य (पा) प्रोषधोपवास व्रतका अतिचार ५८।१८१ अन्तकृद्दशाङ्ग (पा) द्वादशांग का एक भेद २।९३ अन्तप (भो) देशविशेष १११७४ अन्तराय (पा) विघ्नका कारण ५८०२१८ अन्तरिक्ष (पा) अष्टांग निमित्त ज्ञानका एक अंग १०।११७ अन्तरेण (अ) बिना २०११३ अन्तर्दिष् = अन्तरंग शत्रु १।२३ अन्ध्र (भी) धूमप्रभा पृथिवीके चतुर्थप्रस्तारका इन्द्रक बिल ४।१४१ अन्धकवृष्णि (व्य) यदुवंशी शूरका पुत्र १८।१० अन्तर्मूमिचर= विद्याधर जाति २६।११ अन्तर्वस्नी गर्भवती १८३१२० www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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