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________________ ८९६ हरिवंशपुराणे अङ्गना = स्त्री २१९ अङ्गबाह्य (पा) द्वादशांगके परि माणसे बाहरका श्रुत २।१०१ अङ्गारिणी - एक विद्या २२१६२ अङ्गारवती (व्य) स्वर्णाभपुरके राजा चित्तवेगकी स्त्री २४१७० अङ्गारक (व्य) एक विद्याधर १२८१ अङ्ग (भौ) रत्नप्रभाके खर भाग का बारहवां पटल ४।५४ अङ्ग-तालगत गान्धर्वका एक प्रकार १९:१५१ अङ्गावर्त (भौ) वि. द. नगरी २२।९५ अङ्ग (पा) अष्टांगनिमित्तज्ञान का एक अंग १०।११७ अचौर्य महाव्रत (पा) अदत्त वस्तुका ग्रहण नहीं करना २।११९ अच्युत (भौ) अच्युत स्वर्गका ____ तीसरा इन्द्रक ६१५१ अच्युत (भौ) सोलहवाँ स्वर्ग ६.३८ अच्युत (व्य) श्रीकृष्ण नारायण ५०१२ अच्युत (व्य) जरासन्धका पुत्र ५२।३६ अग्रायणीपूर्व (पा) पूर्वगत श्रुतका एक भेद २।९७ अचल (व्य)भगवान् महावीरका नवम गणधर ३।४३ अचल (व्य) अन्धकवृष्णि और सुभद्राका पुत्र १८।१३ अचल (व्य) अचलका पुत्र ४८।४९ अचल (व्य) दूसरा बलभद्र ६०।२९० अचल ग्राम (भौ) एक ग्राम, जहाँ वसुदेवने वनमाला कन्याको प्राप्त किया २४।२५ अजनागिरि (व्य) रुचकगिरिके वर्धमान कूटका निवासी देव ५।७०३. अजनगिरि (भौ) मेरुसे दक्षिण की ओर शोतोदा नदीके पश्चिम तटपर स्थित एक कूट ५।२०६ अन्जन द्वीप (भौ) अन्तिम सोलह द्वीपोंमें पाँचवाँ द्वीप ५।६२३ अञ्जन पर्वत (भौ) नन्दीश्वर द्वीपकी चारों दिशाओंमें स्थित पर्वत-विशेष ५।६५२ अजनमूलक कूट (भौ) रुचिक गिरिका एक कूट ५७०६ अच्युता = एक विद्या २२१६५ अच्यवनलब्धि (पा) आग्रायणी पूर्वकी वस्तु १०।७८ अञ्जनक (भौ) रुचिक गिरिका उत्तरदिशासम्बन्धी कूट ५७१५ अन्जन (भौ) सानत्कुमार युगल में पहला इन्द्रक ६।४८ अजन (भौ) पाण्ड्डकवनका एक भवन ५।३५२ अम्जन (भौ) पूर्वविदेहकारक्षार गिरि ५।२२९ अन्जन (भौ) रत्नप्रभाके खर भागका दसवाँ पटल ४।५३ अञ्जना (भौ) पंकप्रभाका रूढि नाम ४।४६ अन्जनकूट (भौ) मानुषोत्तर पर्वतकी दक्षिण दिशाका एक कूट ५।६०४ अञ्जनकूट (भौ) रुचिक गिरिका एक कूट ५७०६ अग्निभूति (व्य) वैदिक विद्वान् १६८ अनिरुद्ध (व्य) प्रद्युम्नका पुत्र ५५।१७ अनिवृत्तिकरण (पा) परिणाम विशेष ३३१४२ अनिवृत्तिकरण (पा) नौवाँ गुण स्थान ३२८२ अनिवृत्ति (व्य) एक मुनि २७।११३ अनिल वेग(व्य)वसुदेवकी श्यामा स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र ४८१५४ अनवेक्ष्यसंस्तरसंक्रम (पा) प्रोषधोपवास व्रतका अति चार ५८।१८१ अनवेक्ष्यादान (पा) प्रोषधोप वासका अतिचार५८।१८१ अनवेक्ष्यमलोत्सर्ग (पा) पोष धोपवास व्रतका अतिचार ५८।१८१ अनाकांक्षा (पा) एक क्रिया ५८७८ अनादर (व्य) जम्बूवृक्षपर रहने वाला देवविशेष ५।१८१ अनादर (पा) प्रोषधोपवास व्रत का अतिचार ५८।१८१ अनादरता (पा) सामायिक व्रतका अतिचार ५८।१८० अनाभोग क्रिया (पा) एक क्रिया ५८१७३ अनावृत्त यक्ष (व्य) जम्बूद्वीपका रक्षक यक्ष ५।६३७ अनावृष्टि (व्य) वसुदेव और मदनवेगाका पुत्र ४८।६१ अनावृष्टि = कृष्णका सेनापति ५१३५ अनावृष्टि (व्य) एक राजा ५०७९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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