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________________ प्रधान सम्पादकीय अपने ग्रन्थ समाप्तिकाल के साथ-साथ यह भी उल्लेख किया है कि उन्होंने कहाँ किन स्थानोंमें बैठकर वह रचना की थी। उनकी यह सूचना ग्रन्थके उपान्त्य दो श्लोकों में ( ६६, ५२-५३ ) में पायी जाती है, जहाँ . उन्होंने कहा है कि उस ग्रन्थका बहुभाग पहले वर्धमानपुरके पार्श्वनाथ मन्दिर में बैठकर रचा था और शेष भाग शान्तिनाथके उस शान्तिपूर्ण मन्दिरमें जहाँ दोस्तटिकाके लोगोंने एक बृहत्पूजाका आयोजन किया था । उस समय उत्तर दिशामें इन्द्रायुध, दक्षिणमें कृष्णके पुत्र श्रीवल्लभ तथा पूर्व और पश्चिम में अवन्तिनरेश, वत्सराज तथा सौरमण्डल (सौराष्ट्र ) में वीर जयवराह राज्य करते थे । ये उल्लेख बड़े महत्त्वपूर्ण हैं और सभी इतिहास-लेखकोंने इनका उपयोग किया है । किन्तु कुछ बातों में उलझन भी उत्पन्न हुई है । एक मत यह है कि यहाँ पूर्व में अवन्तिराज वत्सराजका और पश्चिम में सौराष्ट्रके नरेश वीर जयवराहका उल्लेख किया गया है । किन्तु दूसरे मतानुसार यहाँ पूर्व में अवन्तिराज और पश्चिममें वत्सराज तथा वीर जयवराहका उल्लेख समझना चाहिए। इस बात में भी मतभेद है कि इन राज्य सीमाओंका मध्यविन्दु कहा जानेवाला वर्धमानपुर कौन-सा है । ग्रन्थमालाके हम दोनों प्रधान सम्पादक भी इस बातपर एकमत नहीं हैं। डॉ. उपाध्येके मत से यह वर्धमानपुर काठियावाड़का वर्तमान वढवान है, और वहीं इसी पुन्नाट संघके हरिषेणने इससे १४८ वर्ष पश्चात् शक ८५३ में बृहत्कथाकोशकी रचना की थी ( देखिए उक्त ग्रन्थकी प्रस्तावना पृ. १२१ ) | किन्तु डॉ. हीरालाल जैनने अपने एक लेख ( इण्डियन कलचर खण्ड ११, १९४४-४५ पृ. १६१ आदि, तथा जैन सिद्धान्त भास्कर, १२-२ ) में यह प्रमाणित करनेका प्रयत्न किया है कि जिनसेन द्वारा चल्लिखित वर्धमानपुर वर्तमान मध्यभारतके धार जिलेका बदनावर होना चाहिए, क्योंकि उसका प्राचीन नाम वर्धमानपुर पाया जाता है, वहाँ प्राचीन जैन मन्दिरोंके भग्नावशेष अब भी विद्यमान हैं, वहाँसे दुतरिया ( प्राचीन दोस्तटिका ) नामक ग्राम समीप है तथा वहाँसे उक्त राज्य विभाजनकी सीमाएँ ठीक-ठीक इतिहाससंगत सिद्ध होती हैं । इसी प्रश्नके साथ पुन्नाट संघकी शाखाका कर्नाटकसे आकर वर्धमानपुर में स्थापित होने और कमसे कम जिनसेन और हरिषेणके बीच कोई डेढ़ सौ वर्ष तक चलते रहनेका इतिहास भी गवेषणीय है । केवल संघके गिरनार यात्राके लिए आने और वर्धमानपुरमें रुक जानेकी बातसे इस महान् घटनाका पूरा मर्म नहीं खुलता। सम्भव है जैन धर्मके महान् आश्रयदाता राष्ट्रकूट- नरेशोंके मालवा और गुजरात में प्रभुत्व बढ़ने से इस संघपीठकी स्थापनाका कुछ सम्बन्ध हो । शिलालेखों के अनुसार इन प्रदेशोंको राष्ट्रकूटनरेश दन्तिदुर्गने सन् ७५० के लगभग अपने अधीन कर लिया था । ग्रन्थके अन्तिम पद्य में इस हरिवंशपुराणको ऐसा श्रीपर्वत कहा है जिसका कविने बोधिके लाभार्थ आश्रय लिया, और यह आशा व्यक्त की कि यह श्रीपर्वत समस्त दिशाओं में व्याप्त होकर व स्थिरतर बनकर पृथ्वीपर प्रतिष्ठित रहे । प्रश्न है कि यहाँ कवि द्वारा अपनी रचनाको श्रीपर्वतकी उपमा देनेकी सार्थकता क्या है ? विचार करनेपर यहाँ भी भारतीय संस्कृतिकी एक धाराका महत्त्वपूर्ण इतिहास छिपा हुआ दिखायी देता है । बौद्ध साहित्य में श्रीपर्वतका अनेक स्थलोंपर उल्लेख मिलता है । विशेषतः मंजुश्री मूलकल्प (पृ. ८८ ) का यह उल्लेख ध्यान देने योग्य है, श्रीपर्वते महाशैले दक्षिणापथसंज्ञके । श्रीधान्यकटके चैत्ये जिन धातुपरे भुवि । सिद्धयन्ते मन्त्र-तन्त्रा वै क्षिप्रं सर्वार्थ कर्मसु ॥ इस उल्लेखके अनुसार दक्षिणापथ में धान्यकटकके समीप श्रीपर्वत नामक महाशैलपर एक चैत्य है जिसमें जिन (बुद्ध) की अस्थियाँ व भस्मावशेष सुरक्षित हैं । वहाँ साधना करनेसे मन्त्र-तन्त्र शीघ्र सिद्ध होते और सब कामनाएँ सफल होती हैं । बौद्ध साहित्य में ही नहीं, अन्य संस्कृत महाकवियोंने भी श्रीशैलकी इस ख्यातिका उल्लेख किया है । उदाहरणार्थ, महाकवि बाणने अपनी कादम्बरी कथाके एक पात्र वृद्ध द्रविड धार्मिकको 'श्रीपर्वताश्चर्य वार्ता सहस्राभिज्ञ' कहा है तथा हर्षचरित में स्वयं हर्पको कहा है 'सकलप्रणयिमनोरथसिद्धिः श्रीपर्वतः' । भवभूतिने अपने मालतीमाधव नामक नाटकके एक पात्र वौद्ध भिक्षुणी सौदामिनी के Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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