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________________ ८०९ षट्षष्टितमः सर्गः कुर्वन्तु व्याख्यानमनन्यचेतसः परोपकाराय स्वमुक्तिहेतवे। सुमङ्गलं मङ्गलकारिणामिदं निमित्तमप्युत्तममर्थिनां सताम् ॥४२॥ महोपसमें शरणं सुशान्तिकृत् सुशाकुन शास्त्रमिदं जिनाश्रयम् । प्रशासनाः शासनदेवताश्च या 'जिनाँश्चतुर्विंशतिमाश्रिताः सदा ॥४॥ हिताः सतामप्रतिचक्रयान्विताः प्रयाचिताः सन्निहिता भवन्तु ताः। गृहीतचक्राप्रतिचक्रदेवता तथोर्जयन्तालयसिंहवाहिनी। शिवाय यस्मिन्निह सन्निधीयते क तत्र विघ्नाः प्रभवन्ति शासने ॥४४॥ ग्रहोरगा भूतपिशाचराक्षसा हितप्रवृत्ती जनविघ्नकारिणः । जिनेशिनां शासनदेवतागण प्रभावशक्त्याथ शमं श्रयन्ति ते ॥४५॥ प्रकाममाकाक्षितकामसिद्धयः प्रसिद्धधर्मार्थविमोक्षलब्धयः । भवन्ति तेषां स्फुटमल्पयत्नतः पठन्ति भक्त्या हरिवंशमन ये ॥४६॥ निवार्य मात्सर्यमवार्यवीर्यया धिया सुधैर्योर्जितया जिनादराः । अनार्यवर्याः सहिताः सपर्यया पुराणमार्याः प्रथयन्तु विष्टपे ॥४७॥ किं मेऽथवा प्रार्थनया यतस्ततः स्वभावतो विश्वभरक्षमाविदः । पयोधरोन्मुक्तमिवाम्बु भूधरा विधाय मूनि प्रथयन्तु भूतले ॥४८॥ यदि बांचा जायेगा तो उसके फलका तो कहना ही क्या है ? ।।४१॥ विद्वज्जन एकाग्रचित्त होकर दूसरोंके उपकारके लिए और अपने-आपकी मुक्ति के लिए इस ग्रन्थका व्याख्यान करें। यह ग्रन्थ मंगल करनेवालोंके लिए उत्तम मंगलरूप है तथा मंगलकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिए मंगलका उत्तम निमित्त भी है ।।४२।। जिनेन्द्र भगवान्का वर्णन करनेवाला यह शान महान् उपसर्गके आनेपर रक्षा करनेवाला है, उत्तम शान्तिका दाता है और उत्तम शकुन रूप है, अप्रतिचक्रदेवतासे सहित, सज्जनोंके हितैषी जो शासनदेव और शासनदेवियां सदा चौबीस तीर्थंकरोंकी सेवा करती हैं उनसे भी मैं याचना करता हूँ कि वे सदा जिनशासनके निकट रहें। चक्ररत्नको धारण करनेवाली अप्रतिचक्रदेवता तथा गिरिनार पर्वतपर निवास करनेवाली सिंहवाहिनीअम्बिकादेवी, जिस जिनशासनमें सदा कल्याणके लिए सन्निहित-निकट रहती हैं उस जिनशासनपर विघ्न अपना प्रभाव कहां जमा सकते हैं ? ||४३-४४॥ हितके कार्यमें मनुष्योंको विघ्न उत्पन्न करनेवाले जो ग्रह, नाग, भूत, पिशाच और राक्षस आदि हैं वे जिनशासनके भक्त देवोंकी प्रभाव शक्तिसे शान्तिको प्राप्त हो जाते हैं। भावार्थ-जिनशासनके भक्त देव स्वयं कल्याण करते हैं तथा अन्य उपद्रवी देवोंको भी शान्त बना देते हैं ॥४५॥ जो भव्य जीव यहाँ भक्तिपूर्वक हरिवंशपुराणको पढ़ते हैं उन्हें थोड़े ही प्रयत्नसे मनोवांछित सिद्धियाँ तथा प्रसिद्ध धर्म, अर्थ और मोक्षकी लब्धियां प्राप्त हो जाती हैं ॥४६|| जिनसे बढ़कर और कोई श्रेष्ठ आर्य नहीं तथा जो मानप्रतिष्ठासे रहित हैं ऐसे जिनेन्द्र भगवान्के भक्त आर्यपुरुष, मात्सर्यको दूर कर अवार्य वीर्यसे युक्त एवं उत्तम धैर्यसे बलिष्ठ बुद्धिके द्वारा इस पुराणको संसारमें प्रसिद्ध करें--इसके अर्थका विस्तार करें ॥४७॥ ___अथवा मुझे प्रार्थना करनेसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि संसारका भार धारण करने में समर्थ पर्वत, जिस प्रकार स्वभावसे ही मेघोंके द्वारा छोड़े हुए जलको अपने मस्तकपर १. जिनाश्चतुर्विशति म.। २. षट्पदवृत्तम् । ३. जिनविघ्न-ख.। ४. गणाः म.। ५. समं म.। ६. प्रथम तु म.। ७. प्रथमं तु म.। १०२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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