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________________ ८०८ हरिवंशपुराणे सदप्रशिध्येण शिवाग्रसौख्यभागरिष्टनेमीश्वरभक्तिमाविना । स्वशक्तिमाजा जिनसेनसुरिणा धियाल्पयोक्ता हरिवंशपद्धतिः ॥२३॥ यदत्र किंचिद्रचितं प्रमादतः परस्परस्याहतिदोषदूषितम् । तदप्रमादास्तु पुराणकोविदाः सृजन्तु जन्तुस्थितिशक्तिवेदिनः ॥३४॥ प्रशस्तवंशो हरिवंशपर्वतः क्व मे मतिः क्वाल्पतराल्पशक्तिका । अनेन पुण्यप्रभवस्तु केवलं जिनेन्द्रवंशस्तवनेन वाञ्छितः ॥३५॥ न काव्यबन्धव्यसनानुबन्धतो न कीर्तिसंतानमहामनीषया । न काव्यवर्गेण न चान्यवीक्षया जिनस्य भक्त्यैव कृता कृतिर्यथा ॥३६॥ जिनाश्चतुर्विंशतिरत्र कीर्तिताः सुकीर्तयो द्वादश चक्रवर्तिनः । नवविधा सीरिहरिप्रतिद्विषस्त्रिषष्टिरित्थं पुरुषाः पुराणगाः ॥३७॥ अवान्तरेऽनेकशतानि पार्थिवा महीचरा व्योमचराश्च भूरिशः। क्षिती चतुर्वर्गफलोपभोगिनः पुराणमुख्येऽन्न यशस्विनः स्तुताः ॥३८॥ अगण्यपुण्यं हरिवंशकीर्तनाद्यदत्र गण्यं गुणसजितं मया । फलादमुष्मान्नु मनुष्यलोकजा भवन्तु भव्या जिनशासनस्थिताः ॥३९॥ जिनस्य नेमेश्चरितं चराचरप्रसिद्ध जीवादिपदार्थमासनम् । प्रवाच्यता वाचकमुख्यसज्जनः समागतः श्रोत्रपुटैः प्रपोयताम् ॥४०॥ जिनेन्द्रनामग्रहणं मवत्यलं ग्रहादिपीडापगमस्य कारणम् । प्रवाच्यमानं दुरितस्य दारणं सां समस्तं चरितं किमुच्यते ॥४॥ है ॥२५-३३।। इस ग्रन्थमें मेरे द्वारा यदि कहीं प्रमादवश पूर्वापर विरोधसे युक्त रचना की गयी हो तो जीवोंकी स्थिति और सामर्थ्यके जाननेवाले पुराणोंके ज्ञाता विद्वान् प्रमादरहित हो उसे ठीक कर लें ॥३४।। कहाँ तो यह उत्तग वंशों-कुलों ( पक्षमें बांसों ) से युक्त यह हरिवंशरूपी पर्वत और कहाँ मेरी अत्यन्त अल्पशक्तिकी धारक क्षुद्रबुद्धि ? मैंने तो सिर्फ जिनेन्द्र भगवानके वंशकी इस स्तुतिसे पुण्योत्पत्तिकी इच्छा की है ॥३५॥ मैंने इस ग्रन्थको रचना व्यसनजन्य संस्कारसे की है, न कीर्तिसमूहकी बलवती इच्छासे की है, न काव्यके अभिमानसे की है, और न दूसरेकी देखा-देखीसे की है। किन्तु यह रचना मैंने मात्र जिनेन्द्र भगवानको भक्तिसे की है ॥३६॥ इस ग्रन्थमें चौबीस तीर्थंकर, उत्तम कीतिके धारक बारह चक्रवर्ती, नो बलभद्र , नौ नारायण और नौ प्रतिनाराय ग इन पुराणगामी त्रेशठ शलाका पुरुषोंका वर्णन किया गया है ।।३७।। इनके सिवाय इस श्रेष्ठ पुराणमें बीच-बीचमें पृथिवीपर चतुर्वर्गके फलको भोगनेवाले सैकड़ों भूमिगोचरो और अनेकों यशस्वी विद्याधरराजाओंका वर्णन किया गया है ॥३८।। हरिवंशका कथन करनेसे जो असंख्य पुण्यका संचय हुआ है उसके फलस्वरूप में यही चाहता हूँ कि मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए भव्यजीव जिनशासनमें स्थित हों ।। ३९ ।। तथा त्रसस्थावरके भेदसे प्रसिद्ध जीव आदि पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले नेमिजिनेन्द्रके इस चरितको बाँचनेवाले मुख्य सज्जन बांचे और सभामें आये हुए श्रोताजन अपने कर्णरूप पात्रोंसे इसका पान करें ॥४०॥ क्योंकि जिनेन्द्र भगवान्का मात्र नाम ग्रहण ही ग्रह-पिशाच आदिकी पीड़ाको दूर करनेका कारण है फिर सत्पुरुषोंके पापको दूर करनेवाला पूरा चरित १. षटपदवृत्तम् । २. व्याहृति क. म., ख. । ३. नवान्यदीय॑या ख.। ४. हरिवंशकीर्तिता म., ख., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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