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________________ चतुःषष्टितमः सर्गः ७९५ कनीयान् जिनदत्तस्ता बन्धुवाक्योपरोधतः । परिणोयापि तत्याज दुर्गन्धामतिदूरतः ॥१२॥ आत्मानमपि निन्दन्ती सोपवासान्यदा च सा। क्षान्तार्यामाथिकायुक्तां भोजयित्वातिमक्तितः ।।१२२॥ अभिवन्द्य तदापृच्छदार्यिके केन हेतुना । इमे परमरूपिण्यौ स्थिते तपसि दुष्करे ।।१२३॥ सेति पृष्टा जगौ हेतुमार्ययोस्तपसस्तयोः । प्रबोधनाय तस्याश्च करुणापरिनोदिता ।।१२४॥ श्रयतां सुकुमारि द्वे सुकुमारकुमारिके । हेतुता येन तापस्ये तपस्विन्यौ व्यवस्थिते ॥१२५।। सौधर्माधिपतेर्देव्याविमे पूर्वत्र जन्मनि । विमला सुप्रभा चेति सुप्रसिद्ध बभूवतुः ॥१२॥ ते नन्दीश्वरयात्रायां जिनपूजार्थमागते । कथंचिजातसंवेगे चित्तान्तरमिति श्रिते ॥१२७॥ मनुष्यमवसंप्राप्ती करिष्यावो महत्तपः । आवां स्त्रीत्वनिमित्तं तु येन दुःखं न दृश्यते ॥१२८॥ इति संगीर्य ते देव्यो दिवः प्रच्युस्य भूपतेः । श्रीषेणस्येह साकेते श्रीकान्तायां सुयोषिति ॥१२९॥ हरिषेणा सुता ज्येष्ठा श्रीषेणा च कनीयसी । जाते जाते च कान्ते ते यौवनश्रीविभूषिते ॥१३०॥ स्वयंवरविधी स्मृत्वा पूर्व जन्म च संगरम् । बन्धुलोकं परित्यज्य कुमायौं तपसि स्थिते ॥१३१॥ इति श्रुत्वार्यिकावाक्यं निर्विण्णा सुकुमारिका । तदन्ते सा प्रवव्राज संसारमयवेदिनी ॥१३२॥ तपस्विनीभिरन्याभिस्तपस्यन्ती तपस्विनी। कालं नीतवती नीत्या तपसा शोषितानिका ॥१३३॥ करना चाहा पर उसे वह स्वीकृत नहीं था इसलिए वह उस कन्याको छोड़ सुव्रत मुनिके समीप दीक्षित हो गया ॥१२०॥ बन्धुजनोंके उपरोधसे छोटे भाई जिनदत्तने यद्यपि उसके साथ विवाह कर लिया परन्तु दुर्गन्धके कारण उसे दूरसे ही छोड़ दिया ॥१२१।। इस घटनासे सुकुमारिकाने अपनी बहुत निन्दा की। एक दिन उसने उपवास किया तथा अनेक आर्यिकाओंसे युक्त क्षान्ता नामकी आर्यिकाको बड़ी भक्तिसे भोजन कराया ॥१२२॥ क्षान्ता आर्यिकाके साथ दो आर्यिकाएं परम रूपवती तथा कठिन तपन तपनेवाली थीं उन्हें देख उसने क्षान्ता आर्याको नमस्कार कर उनसे पूछा कि हे आयें ! ये दो रूपवती आर्यिकाएं कठिन तपमें किस कारण स्थित हैं ? ।।१२३।। इस प्रकार पूछे जानेपर दयासे प्रेरित क्षान्ता आर्याने सुकुमारिकाको सम्बोधन करनेके लिए उन दो आर्यिकाओंके तपका कारण कहा ॥१२४।। उन्होंने कहना प्रारम्भ किया-कि हे सुकुमारि ! सुन, ये सुकुमार कुमारिकाएं जिस कारण तपस्विनी बनकर तप करने में लगी हुई हैं ।।१२५।। ये दोनों पूर्व भवमें सौधर्म स्वर्गके इन्द्रकी विमला और सुप्रभा नामकी देवियाँ थीं ॥१२६।। एक दिन ये नन्दीश्वर पर्वकी यात्रामें जिनपूजाके लिए आयी थीं कि किसी कारण संसारसे विरक्त हो चित्तमें इस प्रकारका विचार करने लगी कि यदि हम मनुष्यभवको प्राप्त हों तो महातप करेंगी। ऐसा महातप कि जिससे फिर यह स्त्री-पर्यायसम्बन्धी दुख दिखाई नहीं देगा ॥१२७-१२८।। इस प्रकार प्रतिज्ञा कर वे देवियाँ स्वर्गसे च्युत हुई और यहाँ अयोध्या नगरीके राजा श्रीषेणकी श्रीकान्ता नामक स्त्रीसे हरिषेणा नामकी बड़ी और श्रीषेणा नामकी छोटी पुत्री हुई। समय पाकर ये दोनों ही रूपवती और यौवनरूपी लक्ष्मीसे सुशोभित हो गयीं ॥१२९-१३०|| इन दोनों कुमारियोंका स्वयंवर हो रहा था कि उसी समय इन्हें अपने पूर्व जन्म तथा की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया जिससे ये बन्धुजनोंको छोड़ तत्काल तप करने लगीं ॥१३१।। क्षान्ता आर्यिकाके उक्त वचन सुन सुकुमारिका भी विरक्त हो गयो और संसारसे भयभीत हो उन्हीं के समीप दीक्षित हो गयी ॥१३२।। अन्य तपस्विनियोंके साथ तप करती हुई वह समय व्यतीत करने लगी। नीतिपूर्वक-आगमानुकूल तप करनेसे उसका शरीर सूख गया ॥१३३।। TH १. -रोधनः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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