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________________ ७९४ हरिवंशपुराणे स्तोकाः समुदसिद्धास्तु स्युः संख्येयगुणाः पुनः । द्वीपसिद्धा इतीहेत्थमविशेषेण भाषिताः ॥१७॥ 'लवणोदेऽत्र ये सिद्धाः सर्वतोकास्तु ते स्तुताः। कालोदसिद्धा बोद्धव्यास्तत्संख्येयगुणाः सदा ॥१०८॥ ये जम्बूद्वीपसिद्धास्ते स्युः संख्येय गुणास्तथा । धातकीखण्डसिद्धाश्च पुष्करद्वीपगास्तथा ॥१०९॥ यथा क्षेत्रविभागेन प्रोक्ताल्पबहुता तथा । सा कालादिविभागेन वेदितव्या यथागमम् ॥११०॥ इति दृग्ज्ञानचारित्रतपसामत्युपासकाः । सोमदत्तादयोऽन्त्ये ते पञ्च भूत्वारणाच्युते ॥१११॥ देवाः सामानिका भोगं द्वाविंशत्यब्धिजीविनः । भुञ्जानास्तस्थुरत्यन्तशुदर्शनदर्शनाः ॥११२॥ नागश्रीरपि मृत्वाप फलं धूमप्रभावनौ । अनुभूय महादुःखं सा सप्तदशसागरम् ।।११३॥ भूत्वा स्वयंप्रमद्वीपे दुष्टो दृष्टिविषोरगः । त्रिसागरोपमायुष्कां मृत्वागाद्वालुकाप्रमाम् ॥११४॥ सत्रानुभूय दुःखौघांश्चिरादुद्वर्त्य पापतः । सस्थावरकायेषु सानयत्सागरद्वयम् ॥११५।। ततो मातङ्गकन्याभूच्चम्पायां सान्यदा मुनेः । समाधिगुप्ततः कृत्वा मधुमांसादिवर्जनम् ॥११६॥ जीवितान्ते सुबन्धोः स्याच्चम्पायामेव वैश्यतः । धनवत्यां सुता जाता नाम्ना च सुकुमारिका ।।११७।। पापानुबन्धदोषेण सुदुर्गन्धशरीरिका । रूपवत्यपि विद्वेष्या जाता युवजनस्य सा ।।११८॥ वैश्यस्य धनदेवस्याशोकदत्तासमुद्भवौ । तनयो जिनदेवश्च जिनदत्तश्च विश्रुतौ ॥११९॥ कन्यां तामपि दुर्गन्धा वृतां बन्धुमिरग्रजः । परित्यज्य प्रववाज सुव्रतः सुव्रतान्तिके ।।१२०॥ समुद्रसे सिद्ध होनेवाले थोड़े हैं, इनसे संख्यातगुणे द्वीपसे सिद्ध होनेवाले हैं, यह सामान्यकी अपेक्षा कथन है, विशेषकी अपेक्षा लवणसमुद्र में जो सिद्ध होते हैं, वे सबसे थोड़े हैं, उनसे संख्यातगुणं कालोदधिसे सिद्ध होनेवाले हैं ॥१०७-१०८॥ जो जम्बद्वीपसे सिद्ध होते हैं वे संख्येयगुणे हैं, उनसे संख्यातगुणे धातकीखण्डसे होनेवाले सिद्ध हैं और उनसे संख्यातगुणे पुष्करद्वीपसे होनेवाले सिद्ध हैं ॥१०९।। जिस प्रकार क्षेत्रविभागको अपेक्षा अल्पबहुत्वका कथन किया है उसी प्रकार आगमके अनुसार काल आदि विभागको अपेक्षा भी जानना चाहिए ॥११०॥ इस प्रकार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी अत्यन्त उपासना करनेवाले सोमदत्त आदि पांचों जीव अन्त समय मरकर आरण अच्युत स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ बाईस सागरकी उनकी आयु थी। अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले वे देव उत्तम भोग भोगते हुए वहाँ बाईस सागर तक स्थित रहे ॥१११-११२॥ विपमिश्रित भोजन देनेवाली नागश्री भी मरकर धूमप्रभानामक पाँचवें नरकके फलको प्राप्त हुई। वह सत्तरह सागर तक वहांके महादुःख भोगकर निकली और स्वयंप्रभद्वीपमें दृष्टिविप नामका दुष्ट सर्प हुई। तदनन्तर मरकर तीन सागरको आयुवाली बालुकाप्रभानामक तीसरी पृथ्वीमें पहुँची ॥११३-११४॥ वहाँ पापके फलस्वरूप चिरकाल तक दुःखों का समूह भोगकर निकली और सस्थावर पर्यायमें दो सागर तक भटकती रही ॥११५।। तदनन्तर चम्पापुरीमें एक चण्डालकी कन्या हुई। वहां उसने एक दिन समाधिगुप्त नामक मुनिराजके पास मधु-मांसादिका त्याग किया ॥११६।। जिससे अन्त समय उसी चम्पापुरीमें सुबन्धु वैश्यको धनवती स्त्रीसे सुकुमारिका नामकी पुत्री हुई ॥११७॥ पापके पूर्व संस्कारसे उसके शरीरसे तीव्र दुर्गन्ध ' थी इसलिए रूपवती होनेपर भी वह युवाजनोंके द्वेषका पात्र हुई ॥११८। उसी नगरीमें धनदेव वैश्यको अशोकदत्ता नामक स्त्रीसे उत्पन्न जिनदेव और जिनदत्त नामक दो पुत्र रहते थे ।।११९।। जिनदेवके कुटुम्बी जनोंने उस दुर्गन्धा कन्याके साथ उसका विवाह १. -मप्यशेषेण म.। २, लवणोदे त्रयः म.। ३. एष सर्व उल्लेखः 'क्षेत्रकालगति--इत्यादिसूत्रस्य सर्वार्थसिद्धिटीकयानुप्राणितो वर्तते । ४. दुःखौघं कः । ५. तत्र स्थावर-म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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