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________________ त्रिषष्टितमः सर्गः ७८३ लाक्षलेशतृणशर्करादिमिः कर्कशैः स शयनासनादिषु । पीडितोऽप्यविकृतान्तरस्तृणस्पर्शरूढिमरुणत्परीषहम् ।। १०८॥ अस्पृशन करनखैस्तनुं मुनिः शोमते स्म धवलो मलावृतः । शैलतुङ्गशिखराश्रितो यथा कालमेघपटलावृतः शशी ॥१.१॥ नादरे परकृते कृतादरोऽनादरे च न मनोविकारवान् । शुद्धधीविषहते स्म तत्पुरस्काररूढमपरं परीषहम् ॥११॥ वादिवाग्मिगमको महाकविः सांप्रतं सक शास्त्रविद्धवि । नास्मदन्य इति हि स्सयो मनाक प्रजया न परिषद्यदूषितः ॥११॥ अज्ञ एष न पशुर्न मानुषो वीक्षते न हि न भाषते मृषा । मौनमित्य बुधवाच्य वज्ञयाज्ञानमेष सहते परीषहम् ॥११२॥ वार्तमुग्रतपसा महर्धयः पूर्वमित्यनुपलब्धितोऽधुना । इत्यनुक्तिरतिशुद्धदर्शनोऽदर्शनाख्यससहत्परीषहम् ॥११६॥ इत्यशेषितपरीषहारिणा सीरिणा विषयदोपहारिणा । अभ्यतप्यत तपोऽतिहारिणा जैनसञ्चरणभूविहारिणा ॥१४॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृती बलदेवतपोवर्णनो नाम त्रिषष्टितमः सर्गः ॥६३॥ शयन, आसन आदिके समय कठोर लाखके कण, तण तथा कंकड आदिके द्वारा पीडित होनेपर भी उनके अन्तरंगमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न नहीं होता था और भी तणस्पर्श-परीषहको अच्छी तरह सहन करते थे ॥१०८।। जो हाथके नाखूनोंसे शरीरका कभी स्पर्श नहीं करते थेनखोंसे शरीरका मल नहीं छुटाते थे ऐसे मैलसे आवृत शुभ्रकाय मुनिराज, पहाड़की ऊँची चोटीपर स्थित काले-काले मेघोंके पटलसे ढंके चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१०९।। यदि दूसरे लोग उनका आदर करते थे, तो उन्हें प्रसन्नता नहीं होती थी और अनादर करते थे तो मनमें विकार भाव नहीं लाते थे। आदर और अनादर दोनोंमें ही अपनी बुद्धिको सदा विशुद्ध रखते थे, इस तरह वे सत्कार पुरस्कार-परीषहको अच्छी तरह सहन करते थे ॥११०।। इस समय पथिवीपर मझसे बढकर न कोई वादी है, न वाग्मी है. न गमक है और न महाकवि है। इस प्रकारके अहंकारको उन्होंने प्रज्ञा-परीषहके द्वारा किंचित् भी दूषित नहीं होने दिया था ॥११॥ यह अज्ञानी न पशु है, न मनुष्य है, न देखता है, न बोलता है, व्यर्थ ही इसने मौन ले रखा है। इस प्रकारके अज्ञानी जनोंके वचनोंकी परवाह न कर वे अज्ञान-परीषहको सहन करते थे ॥११२॥ उग्र तपके प्रभावसे पहले बड़ी-बड़ी ऋद्धियाँ प्राप्त हो जाती थीं यह कहना व्यर्थ है क्योंकि आज तक हमें एक भी ऋद्धिकी प्राप्ति नहीं हुई। इस प्रकार शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले बलदेव मुनिराज कभी नहीं कहते थे । इस तरह उन्होंने अदर्शन परीषहको अच्छी तरह सहन किया था ।।११३।। इस प्रकार जिन्होंने परीषहरूपी शत्रुओंको समाप्त कर दिया था। जो पंचेन्द्रियों के विषयरूपी दोषको हरनेवाले थे, शरीरसे अत्यन्त सुन्दर थे, और जिनेन्द्रप्रणीत सम्यक् चारित्रकी भूमिकामें विहार करनेवाले थे ऐसे मुनिराज बलदेवने चिरकाल तक तप किया ॥११४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहले युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें बलदेवके तपका वर्णन करनेवाला बेसठवाँ सर्ग समाप्त हआ।।६३॥ १. क., ङ. पुस्तकयोः ११३-११४ श्लोकयोः क्रमभेदो वर्तते । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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