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________________ wwwm ७८२ हरिवंशपुराणे तीर्थभूमिविहतिः ससंयमावश्यकेष्वपरिहाणितो व्रजन् । वाहनाधन भिसध्य चर्यया खिद्यते स्म न परीषहाख्यया ॥१०॥ प्रासुकास्वथ विविक्तभूमिषु ध्यानधौतधिषणो विभूतधीः । क्षेत्रकालनियतासनेत्वसौ बाध्यते स्म न निषद्ययानिशम् ॥११॥ ध्यानतोऽध्ययनतो मुनिः क्रमादल्पकाल नियताल्पनिद्रया। एकपार्श्वकृतभूभिशय्यया 'नावृतोऽपि निशि न प्रपीडितः ॥१०२॥ दुर्जनैनिशितदुर्वचोऽस्साकैराहतोऽपि हृदयेऽतिदुस्सहैः । क्रोशबाधसहनः क्षमावृतः स्यामिति स्मृतिमदत्त धीरधीः ॥१०३॥ अस्त्रशस्त्रनिवर्वपुर्वधः प्राप्यते यदि नु मे तथाप्यलम् । सद्यते वधपरीषहो मयेत्येष बुद्धिमदधादनारतम् ॥१०॥ बाह्यमान्तरमसौ तपश्चरनस्थिशेषवषुषः स्थितिं प्रति । व्यापृतोऽपि समयव्यवस्थया याचनाख्यमजयत्परीषहम् ॥१०५॥ मौनिना निजशरीरदर्शिना संहितेन हितचन्द्रचर्यया। लब्ध्यलब्धिसुधियामुना जितोऽलाभनामविदित: परीषहः ॥१०६॥ रूक्षशीतलविरुद्धभुक्तिजा वातपित्तकफकोपजां रजम् । सोऽप्रतिक्रियतयावधीरयन् रोगसंज्ञमजयत्परीषहम् ।।१०७॥ wwwwwww वे संयमी मनष्योंके आवश्यक कार्यों में हानि न कर सवारी आदिका विचार किये बिना ही तीर्थक्षेत्रोंके लिए विहार करते थे और चर्या-परीषहसे कभी खेदखिन्न नहीं होते थे ॥१००|| प्रासुक और एकान्त भूमियोंमें ध्यान करनेसे जिनकी बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो गयी थी तथा जो उत्कृष्ट बुद्धि के धारक थे ऐसे बलदेव मुनिराज, क्षेत्र अथवा कालमें निश्चित आसनोंके बीच निषद्या-परीषहसे कभी दुःखी नहीं होते थे ॥१०१॥ वे मुनि ध्यान और अध्ययनमें सदा निमग्न रहते थे, इसलिए रात्रिके समय क्रम-क्रमसे बहुत थोड़ी निद्रा लेते थे वह भी पृथिवीरूपी शय्यापर एक करवटसे और बिना कुछ ओढ़े हुए"। इस प्रकार वे शय्या-परीषहसे कभी पीड़ित नहीं होते थे ॥१०॥ धीर-वोर बुद्धिको धारण करनेवाले बलदेव मुनिराज दुर्जनोंके द्वारा तीक्ष्ण कुवचनरूपी शस्त्रोंसे हृदयमें घायल होनेपर भी कुवचनोंकी बाधा सहते हुए सदा इस बातका स्मरण रखते थे कि मझे क्षमासे यक्त होना चाहिए ॥१०३॥ वे मनि सदा ऐसी बद्धि धारण करते थे कि । वे मुनि सदा ऐसी बुद्धि धारण करते थे कि यदि अस्त्र और शस्त्रके समूहसे मेरा शरीर वधको प्राप्त होता है तो भी मुझे अच्छी तरह वध-परीषह सहन करना चाहिए ।।१०४|| बाह्य और आभ्यन्तर तपको करनेवाले वे मुनि, हड्डीमात्र अवशिष्ट शरीरकी स्थिरताके लिए यद्यपि चरणानयोगकी पद्धतिसे उद्यम करते थे..चर्या के लिए जाते थे पर कभी किसीसे आहार आदिकी याचना नहीं करते थे, इस प्रकार वे याचना-परीषहको जीतते थे ।।१०५।। वे मौनसे आहारके लिए विहार करते थे, अपना शरीरमात्र दिखाते थे, चान्द्री-चर्यासे युक्त रहते थे अर्थात चन्द्रमाके समान अमीर-गरीब सभीके घर प्रवेश करते थे और लाभ-अलाभमें प्रसन्न रहते थे, इस प्रकार उन्होंने अलाभ-परीषहको जीत लिया था ।।१०६।। वे रूखे, शीतल एवं प्रकृतिके विरुद्ध आहार तथा वात, पित्त और कफके प्रकोपसे उत्पन्न रोगका प्रतिकार नहीं करते थे। सदा उसकी उपेक्षा ही करते थे। इस प्रकार रोग-परीषहको उन्होंने अच्छी तरह जीत लिया था ॥१०७|| १. व्याप्तोऽपि ख. । २. दनागतं म.। ३. चण्ड- म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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