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________________ चतुःषष्टितमः सर्गः अथ ते पाण्डवाश्चण्डसंसारमयभीरवः । प्राप्य पल्लवदेशेषु विहरन्तं जिनेश्वरम् ॥१॥ चतुर्विधामराकीर्णसमदस्थानमण्डनम् । तं ते वन्दिरे देवं परीत्य परमेश्वरम् ॥२॥ पीत्वा धर्मामृतं लब्धजिनेन्द्रघनकालतः । पूर्वजन्मानि तेऽपृच्छन् जिनेन्द्रोऽप्यगदीदिति ॥३॥ अत्रैव भरतक्षेत्रे चम्पायां मेघवाहने । रक्षति क्षितिपे क्षोगी कुरुवंशविभूषणे ॥४॥ वित्रस्य सोमदेवस्य सोमिलायां यः सुताः । प्रथमः सोमदत्तोऽभूत्स्सोमिल: सोमभूतिना ॥५॥ अग्निभूत्यग्निलोद्भुतास्तेषां मातुलजाः क्रमात् । धनश्रीरपि सोमश्री गश्रीरिति योषितः ॥६॥ शरीरभोगसंसारनिर्वेदं सर्ववेदवित् । सोमदेवः परिप्राप्य प्रावाजीजिनशासने ॥७॥ त्रयोऽत्र भ्रातरस्तेऽपि जिनशासनमाविताः । गृहधर्मरता जाता धर्मकामार्थसेविनः ॥८॥ मिक्षाकालेऽन्यदा तेषां गृहं धर्मरुचिर्यति: । धर्मपिण्ड इवाखण्डः प्रविष्टश्चन्द्रचर्यया ॥९॥ प्रतिगृह्य तमुत्थाय सोमदत्तो यमीश्वरम् । कार्यव्यग्रतया दाने नागश्रियमयोजयत् ॥१०॥ सा स्वपापोदयात्साधी कोपावेशवशाददात् । विषान्नमेष संन्यासकारीसर्वार्थसिद्धिमैत् ॥११॥ नागश्रीदुष्कृतं ज्ञात्वा ते त्रयोऽपि सहोदराः । दीक्षा वरुणगुर्वन्ते निर्विण्णाः प्रतिपेदिरे ॥१२॥ धनश्रीश्चापि मित्रश्रीगुणवत्यार्यिकान्तिके । अदीक्षिषातां निःशेषभववासविषादतः ॥१३॥ अथानन्तर संसारके तीव्र भयसे भयभीत पाण्डव, पल्लव देशमें विहार करते हुए श्री नेमिजिनेन्द्रके समीप पहुंचे। उस समय भगवान् चार प्रकारके देवोंसे व्याप्त समवसरणको सुशोभित कर रहे थे एवं अष्ट प्रातिहार्यरूप परम ऐश्वर्य से युक्त थे। पाण्डवोंने प्रदक्षिणा देकर भगवान्को नमस्कार किया ।। १-२॥ तदनन्तर प्राप्त हुए जिनेन्द्ररूपी वर्षा कालसे धर्मामृतका पान कर उन्होंने अपने पूर्वभव पूछे और श्रीजिनेन्द्र इस प्रकार उनके पूर्वभव कहने लगे ॥ ३ ॥ इसी भरतक्षेत्रकी चम्पानगरीमें जब कुरुवंशका आभूषणस्वरूप राजा मेघवाहन पृथिवीकी रक्षा करता था, तब वहाँ सोमदेव नामका एक ब्राह्मण रहता था। उसकी सोमिला नामकी स्त्री थी और उससे उसके सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति नामके तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥४-५|| इन पुत्रोंके मामाका नाम अग्निभूति था, उसकी स्त्री अग्निला थी और उन दोनोंके क्रमसे धनश्री, सोमश्री और नागश्री नामकी तीन कन्याएं उत्पन्न हुई थीं जो कि उक्त तीन पुत्रोंकी क्रमसे स्त्रियां हुई थीं ॥ ६॥ समस्त वेदोंका जाननेवाला ब्राह्मण सोमदेव कदाचित् शरीरभोग सारसे विरक्त हो जिनधर्ममें दीक्षित हो गया ।। ७॥ सोमदत्त आदि तीनों भाई भी जिनशासनकी भावनासे युक्त थे इसलिए धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थका सेवन करते हुए गृहस्थ धर्ममें रत हो गये ॥ ८ ॥ किसी समय धर्मरुचि नामक मुनिराज जो धर्मके अखण्ड पिण्डके समान जान पड़ते थे, भिक्षाके समय चान्द्री-चर्यासे उनके घर प्रविष्ट हुए ॥ ९ ॥ सोमदत्तने उठकर बड़ी विनयसे उन मुनिराजको पडिगाहा। पडिगाहनेके बाद किसी अन्य कार्यमें व्यग्न होनेसे वह तो चला गया और दान देनेके कार्यमें नागश्रीको नियुक्त कर गया ॥ १० ॥ अपने पूर्वकृत पापोदयसे मुनिराजके विषयमें कोपके वशीभूत हो नागश्रीने उन्हें विषमिश्रित अन्नका आहार दिया जिससे वे मनिराज संन्यास मरण कर सर्वार्थसिद्धिको प्राप्त हए ॥ ११॥ नागश्रीके इस दुष्कार्यको जानकर वे तीनों भाई बहुत दुःखी हुए और संसारसे विरक्त हो उन्होंने वरुण गुरुके समीप दीक्षा धारण कर ली ।। १२ ।। धनश्री और मित्रश्रीने भी समस्त संसारवाससे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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