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________________ षष्टितमः सर्गः ७४७ कुन्धोर्मण्डलिकत्वे हि त्रिसहस्रेस्तु विंशतिः । पञ्चाशत्सप्तशस्यामा षट्शती विजयः पुनः ॥५०६॥ अरमाण्डलिकत्वेऽपि सहस्राण्येकविंशतिः । चतःशतानि विजयः शेषः प्रागेव भाषितम् ॥५०॥ सुभौमस्य सहस्राणि पञ्च कौमार्यमिष्यते । विजयः पन्चशस्येव प्रचण्डस्य कुमण्डले ॥५०८॥ द्वापष्टयब्दसहस्राणि तथा पम्वशतानि च । बालत्वे गूढवृत्तस्य तस्य राज्यमिहोर्जितम् ॥५०९॥ शतानि पन्च कौमार्य तथा मण्डलनाथता । महापद्मस्य विजयो वर्षाणां तु शतम्रयम् ॥५१०॥ अष्टादश सहस्राणि राज्यं सप्त शतान्यपि । दशवर्षसहस्राणि संयमः संयमार्थिनः ॥५१॥ हरिषेणस्य कौमार्य त्रिशती पाविंशतिः । पञ्चाशता त विजयस्तस्य वर्षशतं मतम् ॥५॥२॥ पञ्चविंशतिसंख्यानि सहस्राणि तथा शतम् । राज्यं च पञ्चसप्तत्या पश्चाशस्त्रिशती तपः ॥५१३॥ और शेष विवरण तीर्थंकरोंके वर्णनके समयमें कहा जा चुका है ।।५०५।। छठे कुन्थुनाथ चकवर्तीकी कुल आयु पंचानबे हजार वर्षकी थी, उसमें तेईस हजार सात सो पचास वर्ष कुमारकालमें, इतने ही माण्डलिक अवस्थामें और छह सौ वर्ष दिग्विजय कालमें व्यतीत हुए तथा शेष वर्णन पहले कर चुके हैं ।।५०६।। सातवें अरनाथ चक्रवर्तीको कुल आयु पचासी हजार वर्षकी थी। उसमें इक्कीस हजार वर्ष कुमार अवस्थामें, इतने ही माण्डलिक अवस्थामें और चार सौ वर्ष दिग्विजयमें व्यतीत हुए। शेष वर्णन पहले किया जा चुका है ॥५०७॥ आठवें सुभौम चक्रवर्तीकी कुल आयु पचासी हजार वर्षकी थी, उसमें पांच हजार वर्ष कुमार अवस्थामें, पांच सौ वर्ष दिग्विजयमें और साढ़े बासठ हजार वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें बीते । ये परशुरामके भयसे आश्रममें पले थे इसीलिए मण्डलीक पद प्राप्त नहीं कर सके। ये पृथिवी मण्डलपर अतिशय तीक्ष्ण प्रकृतिके थे तथा अज्ञानी दशामें रहनेके कारण संयम धारण नहीं कर सके और मरकर सातवें नरक $गये ॥५०८-५०९|| नौवें महापद्म चक्रवर्तीकी आयु तीस हजार वर्षकी थी। उसमें पांच सौ वर्ष कुमार अवस्थामें, पांच सौ वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, तीन सौ वर्ष दिग्विजयमें, अठारह हजार सात सो वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें और दस हजार वर्ष संयमी अवस्थामें व्यतीत हुए हैं ।।५१०-५११।। दसवें हरिषेण चक्रवर्तीको आयु छब्बीस हजार वर्षकी थी। उसमें तीन सौ पचीस वर्ष कुमार अवस्थामें, एक सौ पचास वर्ष दिग्विजयमें, पचीस हजार एक सौ पचहत्तर वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य अवस्थामें और तीन सौ पचास वर्ष संयमी अवस्थामें व्यतीत * शान्तिनाथने चौबीस हजार दो सौ वर्ष तक चक्रवर्ती होकर राज्य भोगा, सोलह वर्ष तक संयमी रहे और सोलह वर्ष कम पचीस हजार वर्ष तक केवली रहे। कुन्थुनाथने तेईस हजार एक सौ पचास वर्ष तक चक्रवर्ती होकर राज्य किया, सोलह वर्ष संयमी रहे और तेईस हजार सात सौ चौंतीस वर्ष तक केवली रहे। ४ अरनाथने इक्कीस हजार छह सौ वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य भोगा, सोलह वर्ष संयमी रहे और सोलह वर्ष कम इक्कीस हजार वर्ष केवली रहे । तिल्लोयपण्णत्तिमें सुभौम चक्रवर्तीकी आयु साठ हजार वर्षको बतायी है। जिसमें पांच हजार वर्ष कुमारकालमें, पांच हजार वर्ष मण्डलीक अवस्थामें, पांच सौ वर्ष दिग्विजयमें और साढ़े उनचास हजार वर्ष राज्य अवस्थामें बीते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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