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________________ षष्टितमः सर्गः अष्टशत्या सहस्राणि ततोऽष्टाविंशतिस्तथा । एकान्नविंशतिस्तस्मात्सहस्राणि शतद्वयम् ॥४५२ ॥ नमेर्नव सहस्राणि षट् शतानि च निर्वृताः । नेमेरष्टौ सहस्राणि षट् सप्त द्वे शते द्वयोः ॥ ४५३॥ यदैव केवलोत्पत्तिः षोडशानां जिनेशिनाम् । तदैव तेषां शिष्याणां सिद्धिः केषांचिदिष्यते ॥ ४५४॥ एकद्वित्रिकषण्मासैरन्येषां शिष्यनिर्वृतिः । एक-द्वि- त्रिचतुवं परपरेषां विनिश्चिता ॥ ४५५॥ त्रिविंशतिसहस्राणि पञ्चानां द्वादशैव तु । तान्येकादशपञ्चानां पञ्चानां दश तान्यतः ॥ ४५६ ॥ अष्टाशीति शतान्येव शिष्याः पञ्चजिनेशिनाम् । षट् सहस्राणि वीरस्य शिष्यास्तेऽनुत्तरोद्भवाः ॥४५७ ॥ ऊर्ध्वग्रैवेयकान्तासु सौधर्मादिषु भूमिषु । शतं त्रीणि सहस्राणि बभूवुर्वृष शिष्यकाः ॥ ४५८ ॥ एकान्नत्रिसहस्राणि द्वितीयस्य दिवं गताः । नवान्यस्य सहस्राणि शिष्या नवशतोयुताः ॥ ४५९॥ नवशत्या सहस्राणि तुरीयस्य तु सप्त वै । ततश्चतुःशतीयुक्ता षट्सहस्त्री दिवंगता ॥४६०॥ लीस हजार आठ सो, अरनाथके सैंतीस हजार दो सौ, मल्लिनाथके अट्ठाईस हजार आठ सौ मुनिसुव्रतनाथके उन्नीस हजार दो सौ, नमिनाथके नो हजार छह सो, नेमिनाथके आठ हजार, पाखंनाथके छह हजार दो सौ और भगवान् महावीर के सात हजार दो सौ हैं ॥ ४४३-४५३ ।। ७४१ किन्हीं आचार्यों का मत है कि- प्रारम्भसे लेकर सोलह तीर्थंकरोंके शिष्य, जिस समय उन्हें केवलज्ञान हुआ था उसी समय सिद्धिको प्राप्त हो गये थे । तदनन्तर चार तीर्थंकरोंके शिष्य क्रमसे एक, दो, तीन और छह मास में सिद्धिको प्राप्त हुए और उनके बाद चार तीर्थंकरोंके शिष्य एक, दो, तीन और चार वर्षमें सिद्धिको प्राप्त हुए * ।।४५४-४५५ ।। प्रारम्भसे लेकर तीन तीर्थंकरोंके बीस-बीस हजार, फिर पांच तीर्थंकरोंके बारह-बारह हजार, फिर पांच तीर्थंकरोंके ग्यारह ग्यारह हजार, फिर पांच तीर्थंकरोंके दश दश हजार, फिर पाँच तीर्थंकरोंके अठासी अठासी सो और महावीरके छह हजार शिष्य अनुत्तर विमानोंमें उत्पन्न होनेवाले हैं ॥४५६ ॥ सौधर्मं स्वर्गसे लेकर ऊर्ध्वं ग्रैवेयक तकके विमानोंमें भगवान् वृषभदेव के तीन हजार एक सौ, अजितनाथके उनतीस सो, सम्भवनाथके नो हजार नौ सौ, अभिनन्दननाथ के सात हजार नौ सो, सुमतिनाथके छह हजार चार सौ पद्मप्रभके चार हजार चार सौ सुपार्श्वनाथके दो हजार चार सौ चन्द्रप्रभके चार हजार, पुष्पदन्तके नौ हजार चार सौ, शीतलनाथके आठ हजार चार १. 'णवस्य अब्भहिय दोसहस्साणि' ति प., अ., च ॥१२३३॥ +. भगवान् महावीरके मुक्त होनेवाले शिष्योंकी संख्या तिलोयपण्णत्ति में चवालीस सौ बतलायी है - 'चउदालसया वीरेसरस्स' अ. ।। १२२९ ॥ अ च । * इस विषयका तिलोयपण्णत्तिमें इस प्रकार स्पष्टीकरण किया गया है उसहादि सोलसाणं केवलणाणण्वसूदि दिवसम्मि । पढमं चिय सिस्सगणा णिस्सेयस संपयं पत्ता ॥१२३०॥ कुंथु चउक्के कमसो इगि दुति छम्मास समय पेरते । मि पहुदि जिणिदेसुं इगि दुति छव्वाससंखाए । १२३१|| अ. चार अर्थात् ऋषभादिक सोलह तीर्थंकरोंके शिष्यगण केवलज्ञान उत्पन्न होनेके दिन पहले ही निःश्रेयस सम्पदाको प्राप्त हुए । कुन्भुनाथ आदि चार तीर्थंकरोंके शिष्यगण क्रमसे एक, दो, तीन और छह मास तक तथा नमि आदि चार जिनेन्द्रोंके शिष्यगण एक, दो, तीन और छह वर्ष तक निःश्रेयस पदको प्राप्त हुए ।। १२३० - १२३१ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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