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________________ ७३४ हरिवंशपुराणे मन्दरार्यो जयोरिष्टसेनश्चक्रायुधस्ततः । स्वयंभूः कुन्थुनामा च विशाखो मल्लिसोमकौ ॥३४८॥ वरदत्तः स्वयंभूः स्यादिन्द्रभूतिर्गणप्रभुः । ऋद्विमिः सप्तभिर्युक्ताः सर्वे ते श्रुतपारगाः ॥३४९॥ वीरस्यै कस्य निष्क्रान्तिस्त्रिशतैर्मल्लिपार्श्वयोः । षडुत्तरैः शतैः षड्भिर्वासुपूज्यजिनस्य तु ॥३५०॥ चतुःसहस्रसंख्यानैर्निष्क्रान्तो वृषभो नृपैः । सहस्रपरिवारास्तु प्रत्येकमितरे जिनाः ॥३५१॥ चतुर्मिरधिकाशीतिः सहस्राणि वृषस्य तु । लक्षं लक्षे ग्रिलक्षाश्च द्विस्त्रिलक्षाः सहस्रकैः ॥३५॥ विंशत्या त्रिंशता युक्तास्तास्तु लक्षात्रयं ततः । सार्धलक्षे पुनर्लक्षे लक्षाशीतिश्चतुर्युता ॥३५३॥ सहस्रणिता सा तु द्वासप्ततिरपीदृशी । अष्टापष्टिश्च षट्पष्टिश्चतुःषष्टिसहस्रकम् ॥३५४॥ द्वाषष्टिश्च सहस्राणि षष्टिः पञ्चादशेव च । चत्वारिंशत्सहस्राणि त्रिंशद्विशतिरेव तु ॥३५॥ अष्टादशसहस्राणि षोडशापि चतुर्दश । सहस्राणि यथासंख्यं गणसंख्या जिनेशिनाम् ॥३५६॥ 'संघः सप्तविधः पूर्वधरशिक्षकभेदतः । सावधिः केवली वादी विक्रिया विपुलायुतः ॥३५७॥ प्रभके दत्तक, पुष्पदन्तके वैदर्भ, शीतलनाथके अनगार, श्रेयांसनाथके कुन्थु, वासुपूज्यके सुधर्म, विमलनाथके मन्दराय, अनन्तनाथके जय, धर्मनाथके अरिष्टसेन, शान्तिनाथके चक्रायुध, कुन्थुनाथके स्वयम्भू, अरनाथके कुन्थु, मल्लिनाथके विशाख, मुनिसुव्रतके मल्लि, नमिनाथके सोमक, नेमिनाथके वरदत्त, पाश्वनाथके स्वयम्भू और महावीरके इन्द्रभूति थे। ये सभी गणधर सात ऋद्धियोंसे युक्त तथा समस्त शास्त्रोंके पारगामी थे ।।३४६-३४९।। भगवान् महावीरने अकेले ही दीक्षा ली थी अर्थात् उनके साथ किसीने दीक्षा नहीं ली थी। मल्लिनाथ और पार्श्वनाथने तीन-तीन सौ राजाओंके साथ, वासुपूज्यने छह सौ छह राजाओंके साथ, वृषभनाथने चार हजार राजाओंके साथ और शेष तीर्थंकरोंने एक-एक हजार राजाओंके साथ दीक्षा ली थी ।।३५०-३५१॥ भगवान् ऋषभदेवके समस्त गणों-मुनियोंकी संख्या चौरासी हजार थी। अजितनाथकी एक लाख, सम्भवनाथकी दो लाख, अभिनन्दननाथकी तीन लाख, सुमतिनाथकी तीन लाख बीस हजार, पद्मप्रभको तीन लाख तीस हजार, सुपार्श्वनाथकी तीन लाख, चन्द्रप्रभकी अढ़ाई लाख, पुष्पदन्तको दो लाख, शीतलनाथकी एक लाख, श्रेयांसनाथकी चौरासी हजार, वासुपूज्यको बहत्तर हजार, विमलनाथकी अड़सठ हजार, अनन्तनाथकी छयासठ हजार, धर्मनाथकी चौंसठ हजार, कुन्थुनाथकी साठ हजार, अरनाथको पचास हजार, मल्लिनाथकी चालीस हजार, मुनिसुव्रतनाथकी तीस हजार, नमिनाथको बीस हजार, नेमिनाथको अठारह हजार, पाश्वनाथकी सोलह हजार और महावोरकी चौदह हजार संख्या थी ।।३५२-३५६।। तीर्थंकर भगवान्का यह संघ १ पूर्वधर, २ शिक्षक, ३ अवधिज्ञानी, ४ केवलज्ञानी, ५ वादी, ६ विक्रियाऋद्धिके धारक और ७ विपुलमतिमनःपर्यय ज्ञानके धारकके भेदसे सात प्रकारका होता १. पुन्वधरसिक्खकोटीके वलिवेकूविविउलमदिवादी। पत्तेक्कं सत्तगणा सव्वाणं तित्थकत्ताणं ॥ १०९८॥ ति.प., अ. ४ । *. तिलोयपण्णत्तिमें वासुपूज्य भगवान्के सहदीक्षितोंकी संख्या छह सौ छिहत्तर बतलायी है। प्रकरणानुसार गाथा इस प्रकार है-- पवजिदो मल्लिजिणो रायकुमारेहिं तिसयमेत्तेहि। पासजिणोवि तह च्चिय एकक च्चिय वड्ढमाणजिणो ॥६६८। छावत्तरिजद छस्सयसंखेहि वासूपज्जसामी य। उसहो तालसएहिं सेसा पुह-पुह सहस्स मेत्तेहिं ॥६६९।। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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