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________________ षष्टितमः सर्गः एकत्रिद्वयेकमासाश्च वर्षाणि त्रिश्च षोडश । षडेकादश संख्याहर्मासा वर्षाण्यतो नव ॥ ३३९॥ षट्पञ्चाशदिनानि स्युर्मासाश्वत्वार एव च । वर्षाणि द्वादशैवातः परं केवलिनो जिनाः ॥ ३४० ॥ आयस्य गणिनो भर्तुरशीतिश्वतुरुत्तरा । नवतिः पञ्चसंयुक्तं शतन्त्रयुत्तरमध्यतः ॥ ३४१॥ शतमेव पुनर्ज्ञेयं षोडशैकादशाधिकम् । पञ्चोत्तरा च नवतिहन्युत्तरा नवतिस्तथा ॥ ३४२ ॥ 'ततोऽष्टकाधिकाशीतिः सप्ततिः सप्तभिर्युता । षट् षष्टिः पञ्च पञ्चाशत्पञ्चाशञ्च ततः परम् ॥ ३४३ ॥ त्रिचत्वारिंशदेवातः षट् त्रिंशस्त्रिंशदन्विता । पञ्चभिस्त्रिंशदप्यस्मादष्टाविंशतिरेव तु ॥ ३४४॥ अष्टादश गणाधीशास्तथा सप्तदश क्रमात् । एकादश दशैव स्युरेकादश च ते पुनः ॥ ३४५॥ आद्यस्याद्यो गणी नाम्ना सेनान्तो वृषभः प्रभोः । सिंहसेनस्ततोऽप्यन्यश्चारुदत्त इतीरितः ॥ ३४६ ॥ वज्रश्च चमरो वज्रचमरो बलिदत्तकौ । वैदर्भश्चानगारश्च कुन्थुश्चापि सुधर्मकः ॥३४७॥ 3 विमलनाथका तीन मास, अनन्तनाथका दो मास, धर्मनाथका एक मास, शान्ति, कुन्थु और अरनाथका सोलह-सोलह वर्ष, मल्लिनाथका छह दिन मुनिसुव्रतनाथका ग्यारह मास, नमिनाथका नौ वर्ष, नेमिनाथका छप्पन दिन, पार्श्वनाथका चार मास और महावीरका बारह वर्ष है । इस छद्मस्थ कालके बाद सभी तीर्थंकर केवली हुए हैं ||३३७-३४०|| भगवान् ऋषभदेवके चौरासी गणधर थे, अजितनाथके नब्बे, सम्भवनाथ के एक सौ पाँच, अभिनन्दननाथके एक सौ तीन, सुमतिनाथके एक सौ सोलह, पद्मप्रभके एक सौ ग्यारह, सुपावंनाथ पंचानबे, चन्द्रप्रभके तेरानबे, पुष्पदन्तके अठासी, शीतलनाथके इक्यासी, श्रेयांसनाथके सतहत्तर, वासुपूज्य के छयासठ, विमलनाथके पचपन, अनन्तनाथके पचास, धर्मनाथके तैंतालीस, शान्तिनाथके छत्तीस, कुन्थुनाथके पैंतीस, अरनाथके तीस, मल्लिनाथके अट्ठाईस मुनिसुव्रतनाथके अठारह, नमिनाथके सत्तरह, नेमिनाथके ग्यारह, पार्श्वनाथके दस और महावीरके ग्यारह गणधर थे* || ३४१-३४५।। + आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रथम गणधर वृषभसेन, अजितनाथ के सिंहसेन, सम्भवनाथ के चारुदत्त, अभिनन्दन के वज्र, सुमतिनाथके चमर, पद्मप्रभके वज्रचमर, सुपार्श्वनाथके बलि, चन्द्र१. ततोऽष्टैकादशाशीतिः म । २. तिलोयपण्णत्तौ तु शीतलनाथस्थ सप्ताशीतिगणधराः प्रोक्ताः । ३. बलदत्तको ग., ख. । ★ तिलोयपण्णत्ति में शीतलनाथके ८१ के स्थानपर ८७ गणधर बतलाये हैं । गाथा इस प्रकार है चुलसीदि णउदि पण तिग सोलस एक्कारसूत्त रसयाई । पणणउदी तेणउदी गणहरदेवा हु अट्ट परि यंतं ।। ९६१ ।। अडसीदो सगसीदी सत्तत्तरि छक्क समाधिया छठ्ठी । पणवण्णा पण्णासा ततो य अनंत परियंतं ।। ९६२ ।। तेदालं छत्तीसा पणतीसा तीस अट्ठबीसा य। अट्ठारह सत्तरसेक्कारस दश एक्कारस य वीरतं ।। ९६३ ।। च. अ. + तिणोयपण्णत्ति में अन्तर है-गाथा इस प्रकार हैं - पढमो हु उससेणो केसरिसेणो य चारुदत्तो य । वज्जचमरो य वज्जो चमरो बलदत्त वेदब्भा ।। ९६४ ॥ जागो कुन्यू धम्मो मन्दिरणामा जओ अरिट्ठो य सेणो चक्कायुषयो सयंभु कुंभो विसाखो य ॥९६५ ॥ मल्लीणमो सुप्पहवरदत्ता सयंभु इंदभूदीओ । उसहादीणं आदिम गणधर णामाणि एदाणि ।। ९६६ ॥ एदे गणधर - णिरूवंमो ।। ९६७ ।। च. अ. देवास विहु अट्ठरिद्धिसंपण्णा । ताणं रिद्धिसरूवं लव मेत्तं तं ऋषभसेन, केसरीसेन े, चारुदत्त, वज्रचामरें, वज्र, चमर, बलदत्त, वैदर्भ, नागे, कुन्थु, धर्म, मन्दिर, जये, अरिष्ट, सेन", चक्रायुध", स्वयम्भू, कुम्भ" विशाख मल्लि सुप्रभ", वरदत्त, स्वयम्भू ब इन्द्रभूति' ये ऋषभादि तीर्थकरोंके प्रथम गणधरोंके नाम हैं । १७ १८ १९ २० , Jain Education International ७३३ > For Private & Personal Use Only 3 www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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