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________________ ७३२ हरिवंशपुराणे पादोऽष्टादशसंख्यानां पूर्णः शेषजिनेशिनाम् । कुमारकालशेषस्य राज्यसंयमकालता ॥३३१॥ कुमाराणां जिनानां तु संयमानेहसोज्झितः । आयु:कालः स कुमारः पञ्चानामपि वर्ण्यते ॥३३२॥ जिनसंयमकालस्तु पूर्वलक्षाथ सोज्झिता । पूर्वाङ्गेन चतुर्मिश्च ह्यष्टामिद्वादशाङ्गकैः ॥३३३॥ ततः षोडशभिहीनो विंशत्या तु ततः परम् । चतुर्विशतिपूर्वाङ्गैरष्टाविंशतिसंख्यकैः ॥३३४॥ दशानामायुषः पादः पादोनो द्वादशस्य सः। मल्लेवर्षशतेनोनो नेमेवर्षशतैस्विमिः ॥३३५॥ त्रिंशद्वर्षविहीनस्तु प्रत्येक पार्श्ववीरयोः । द्वेधा संयमकालोऽयं छाद्मस्थः केवलो स्थितः ॥३३॥ वृषछद्मस्थकालोऽत्र स्यात्सहस्रवर्षाग्यत: । द्वादशाब्दानि पूर्णानि स्युर्वर्षाणि चतुर्दश ॥३३७॥ ततोऽष्टादशवर्षाणि विंशतिस्तु तत: परे । षण्मासा नव वर्षाणि त्रिचतुस्सिद्विमासकाः ॥३३८॥ अजितनाथसे लेकर अठारहवें अरनाथ तक तीर्थकरोंकी जो पूर्ण आयु थी उसका एक चतुर्थ भाग कुमारकाल था, और पूर्ण आयुमें-से कुमारकाल छोड़ देनेपर जो शेष रहता है वह उनके राज्य तथा संयमका काल था। [अन्तिम छह तीर्थंकरोंका कूमारकाल क्रमसे सौ वर्ष, साढ़े सात हजार वर्ष, अढाई हजार वर्ष, तीन सौ वर्ष, तीस वर्ष और तीस वर्ष था ]* ||३३१।। वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पाश्वनाथ और महावीर ये पाँच तीर्थकर बाल-ब्रह्मचारी तीर्थकर थे, इसलिए इनकी आयुका जो काल था उसमें संयमका काल कम देनेपर उनका कुमारकाल कहा जाता है ।।३३२।। श्री वृषभनाथ भगवान्का संयमकाल एक लाख पूर्व था । अजितनाथका एक पूर्वांग कम एक लाख पूर्व, सुमतिनाथका बारह पूर्वाग कम एक लाख पूर्व, अभिनन्दननाथका आठ पूर्वांग कम एक लाख पूर्व, सुमतिनाथ का बारह पूर्वाग कम एक लाख पूर्व, पद्मप्रभका सोलह पूर्वाग कम एक लाख पूर्व, सुपार्श्वनाथका बोस पूर्वांग कम एक लाख पूर्व, चन्द्रप्रभका चौबीस पूर्वांग कम, पुष्पदन्तका अट्ठाईस पूर्वांग कम, वासुपूज्यका पूर्ण आयुका तीन चौथाई भाग, (चौवन लाख वर्ष ) मल्लिनाथका सौ वर्ष कम पूर्ण आयु ( सौ वर्ष कम पचपन हजार वर्ष ), नेमिनाथका तीन सौ वर्ष कम पूर्ण आयु ( सात सौ वर्ष ), पार्श्वनाथका तीस वर्ष कम पूर्ण आयु ( सत्तर वर्ष), महावोरका तीस वर्ष कम बहत्तर वर्ष ( बयालीस वर्ष ) और शेष दस तीर्थंकरोंका अपनी आयुका एक चौथाई भाग संयमकाल था। समस्त तीर्थंकरोंका यह संयमकाल छद्मस्थ काल और केवलिकालकी अपेक्षा दो प्रकारका है ।।३३३-३३६।। वृषभनाथका छद्मस्थ काल एक हजार वर्ष, अजितनाथका बारह वर्ष, सम्भवनाथका चौदह वर्ष, अभिनन्दननाथका अठारह वर्ष, सुमतिनाथका बीस वर्ष, पद्मप्रभका छह मास, सुपार्श्वनाथका नौ वर्ष, चन्द्रप्रभका तीन मास, पूष्पदन्तका चार मास, शीतलनाथका तीन मास, श्रेयांसनाथका दो मास, वासुपूज्यका एक मास, १. कुमारकाल: शेषस्य म. । * तिलोयपण्णत्तिके च. अ. गाथा नं. ५८४ का अनुवाद है । +. नौवें पुष्पदन्तसे लेकर धर्मनाथ तकका छद्मस्थ काल यहाँ ४, ३ आदि मास बतलाया है परन्तु तिलोयपण्णत्तिमें ४, ३ आदि वर्ष बतलाया है । तिलोयपण्णत्तिकी गाथाएँ इस प्रकार हैं -- उसहादीसुवासा सहस्स बारस चउद्दसट्टरसा । बोस छदुमत्थकालो छच्चिय पउमप्पहे मासा ॥६७५।। वासाणि णव सुपासे मासा चंदप्पहम्मि तिणि तदो। चदु तिदु एक्का तिदु इगि सोलस चउवग्ग चउकदी वासा ॥६७६। मल्लिजिणे छद्दिवसा एक्कारस सुयदे जिणे मासा । णमिणाहे णव मासा दिणाणि छप्पण्ण मिजिणे ।।६७७॥ पासजिणे च उमासा वारसवासाणि वड्ढमाणजिणे । एत्तियमेत्ते समये केवलणाणं न ताण उप्पणं ॥६७८॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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